भोजशाला में हाईकोर्ट फैसले के बाद पहली बार शुक्रवार को नमाज नहीं, सनातनियों ने की मां वाग्देवी की पूजा
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर में 22 मई 2026 को ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला — हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद पहली बार शुक्रवार को परिसर में नमाज अदा नहीं की गई, जिसमें भोजशाला को हिंदू मंदिर माना गया और हिंदू समुदाय को विशेष पूजा का अधिकार प्रदान किया गया। बड़ी संख्या में सनातनी श्रद्धालु मां वाग्देवी (सरस्वती) की पूजा-अर्चना के लिए परिसर में पहुँचे और शासन-प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया।
मुख्य घटनाक्रम
हाईकोर्ट के फैसले के बाद शुक्रवार, 22 मई को भोजशाला परिसर में पहली बार नमाज नहीं हुई। तनावपूर्ण माहौल के बावजूद सनातनी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूजा के लिए उपस्थित रहे। परिसर में उत्सव जैसा वातावरण रहा और श्रद्धालुओं ने इसे हिंदू समाज की ऐतिहासिक जीत बताया।
श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया
गोसेवक एवं श्रद्धालु जीतू रघुवंशी ने बताया कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मां वाग्देवी की पूजा-अर्चना की जा रही है। उन्होंने कहा कि सनातनियों में उत्सव का माहौल है और श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूजा के लिए आ रहे हैं।
महिला श्रद्धालु प्रभावती ने इस दिन को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि हिंदू समाज और सनातनियों ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि वर्ष 2003 में 'भोजशाला ताला तोड़ो आंदोलन' के दौरान उन्हें 15 दिन की गिरफ्तारी झेलनी पड़ी थी और उस आंदोलन में हजारों हिंदू शामिल हुए थे। एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि इस दिन के लिए हिंदू समाज ने लंबा संघर्ष किया है और हाईकोर्ट के फैसले से सत्य की जीत हुई है।
एक पुरुष श्रद्धालु ने मांग की कि मां वाग्देवी का भव्य मंदिर बनाया जाए ताकि विश्वभर का हिंदू समाज यहां पूजा के लिए आ सके। उन्होंने कहा कि यह पहला अवसर है जब शुक्रवार के दिन सनातनी मां सरस्वती के दर्शन और पूजन कर रहे हैं।
भोजशाला विवाद की पृष्ठभूमि
भोजशाला विवाद लंबे समय से मध्य भारत के सबसे संवेदनशील धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में शुमार रहा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थल 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा मां सरस्वती के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यहां सदियों से कमाल मौला मस्जिद मौजूद है और पूर्व प्रशासनिक व्यवस्थाओं के ज़रिये इस स्थल की कानूनी स्थिति पहले ही तय की जा चुकी है।
गौरतलब है कि यह विवाद दशकों पुराना है और 2003 का 'ताला तोड़ो आंदोलन' इस संघर्ष का एक प्रमुख अध्याय रहा है, जिसमें हजारों लोगों की गिरफ्तारियाँ हुई थीं।
आम जनता पर असर
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद धार और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। प्रशासन की सतर्कता के बीच पूजा शांतिपूर्वक संपन्न हुई। श्रद्धालुओं ने शासन और प्रशासन दोनों का आभार व्यक्त किया।
क्या होगा आगे
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब यह देखना होगा कि परिसर के भविष्य को लेकर कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाती है। हिंदू पक्ष ने भव्य मंदिर निर्माण की माँग उठाई है, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से इस फैसले पर आगे की कानूनी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह मामला मध्य प्रदेश की धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।