भोजशाला पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले का भाजपा ने किया स्वागत, कहा — सनातन संस्कृति की ऐतिहासिक जीत
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार स्थित भोजशाला को हिंदू मंदिर घोषित करते हुए हिंदुओं को वहाँ पूजा का पूर्ण अधिकार दिया है। 16 मई को आए इस फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं ने इसे राजा भोज और माँ सरस्वती की सनातन परंपरा की पुनर्स्थापना बताते हुए स्वागत किया। कोर्ट ने साथ ही मुसलमानों के लिए नमाज़ हेतु अलग भूमि आवंटित करने का निर्देश भी दिया।
भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया
भाजपा सांसद कमलजीत सहरावत ने कहा, 'हर धार्मिक स्थल का अपना महत्व होता है। धार में राजा भोज और माँ सरस्वती की पूजा से जुड़ा यह स्थान ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है, जो सराहनीय है।'
झारखंड के भाजपा विधायक सी.पी. सिंह ने रांची में कहा, 'भोजशाला राजा भोज के काल से है। मुगलकाल में कई मंदिरों और सांस्कृतिक स्थलों को बदला गया था — धार में भी यही हुआ। अब कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर कहा कि यह हिंदू मंदिर है और वहाँ पूजा का अधिकार है।'
भाजपा विधायक ओम प्रकाश ने फैसले को संतुलित बताते हुए कहा, 'हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं को देखते हुए यह निर्णय लिया है। कोर्ट ने हिंदुओं को पूजा का पूरा अधिकार दे दिया है और साथ ही मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने के लिए अलग ज़मीन दिए जाने की बात कही है — यह दोनों पक्षों को ध्यान में रखकर सुनाया गया संतुलित फैसला है।'
उत्तर प्रदेश सरकार की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश के मंत्री सुरेंद्र दिलेर ने लखनऊ में कहा, 'यह सनातन धर्म के लिए अत्यंत हर्ष और सम्मान का विषय है। हाईकोर्ट ने निष्पक्ष भाव से फैसला सुनाया है। इस निर्णय से हमारी आस्था की पुष्टि हुई है।'
ओवैसी की टिप्पणी पर पलटवार
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले में बाबरी मस्जिद मामले जैसी समानताएँ बताई हैं। इस पर मंत्री सुरेंद्र दिलेर ने तीखा जवाब देते हुए कहा, 'अगर एक वकील के रूप में वह हाईकोर्ट के फैसले पर ऐसी टिप्पणियाँ कर रहे हैं, तो लगता है कि वे खुद लोकतंत्र के खिलाफ बोल रहे हैं।' गौरतलब है कि कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी फैसले पर असहमति जताई है।
फैसले का आधार और व्यापक संदर्भ
भाजपा नेताओं का कहना है कि यह फैसला ऐतिहासिक साक्ष्यों, पुरातात्विक महत्व और विधिसम्मत प्रक्रिया पर आधारित है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में धार्मिक स्थलों से जुड़े कई विवाद न्यायालयों में विचाराधीन हैं। भोजशाला का यह मामला वर्षों से चला आ रहा था और इस फैसले के बाद देशभर में राजनीतिक और सामाजिक चर्चा तेज़ हो गई है।
आगे क्या
फैसले के विरोध में कुछ संगठनों द्वारा उच्चतर न्यायालय में अपील की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भोजशाला परिसर में व्यवस्था और क्रियान्वयन को लेकर प्रशासन की भूमिका अब केंद्र में होगी। राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ आने वाले दिनों में इस मुद्दे को और अधिक चर्चित बना सकती हैं।