घुटनों के बल बाबाधाम: लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह की अदम्य आस्था की यात्रा
सारांश
मुख्य बातें
लखीसराय निवासी सुबोध कुमार सिंह इन दिनों बिहार में आस्था और हठ योग की एक अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं — वे घुटनों के बल चलकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार देवघर पहुँचने का संकल्प लेकर निकले हैं। 28 जुलाई को सुल्तानगंज से गंगाजल उठाकर शुरू हुई यह यात्रा अब तक 18 किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी है, जबकि प्रतिदिन केवल एक से डेढ़ किलोमीटर की रफ्तार से यह सफर आगे बढ़ रहा है।
यात्रा का संकल्प और पृष्ठभूमि
सुबोध कुमार सिंह इससे पहले अपने गुरु श्री श्री 108 दयाराम दास जी महाराज के साथ वर्ष 2009 से लेकर अब तक करीब 9 बार दंडवत यात्रा करते हुए बाबाधाम जा चुके हैं। इस बार उनके मन में कुछ अलग करने की प्रेरणा जागी और उन्होंने घुटनों के बल चलकर देवघर पहुँचने का निर्णय लिया।
सुबोध के अनुसार, 'यह यात्रा किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए नहीं है — यह बाबा बैद्यनाथ के प्रति समर्पित एक हठ योग है।' उनका कहना है कि महादेव अंतर्यामी हैं और उनसे कुछ भी छिपा नहीं। जिस तरह धार्मिक कार्य का विचार पहले मन में आता है, उसी प्रकार इस बार घुटनों के बल बाबा के दरबार जाने की प्रेरणा उनके भीतर से उठी।
शरीर पर असर और परिवार का विरोध
यात्रा के शुरुआती दो दिनों में सुबोध ने पाँच से छह किलोमीटर से अधिक दूरी तय की। इसके बाद लगातार जमीन पर घुटनों के बल चलने से दोनों घुटनों की खाल छिल गई, गहरे जख्म हो गए और दर्द बढ़ता गया — फिर भी उन्होंने यात्रा रोकने से इनकार कर दिया।
परिवार ने शुरुआत में इस यात्रा का विरोध किया, लेकिन सुबोध का संकल्प अटल रहा। वे अपने बेटे और एक मित्र को साथ लेकर सुल्तानगंज से निकल पड़े। उनके चेहरे पर दर्द के बावजूद विश्वास साफ झलकता है।
हर कदम एक परीक्षा
सामान्य परिस्थितियों में सुल्तानगंज से देवघर की 105 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा कुछ दिनों में पूरी हो जाती है, लेकिन घुटनों के बल चलने पर यह दूरी हर कदम पर एक नई परीक्षा बन जाती है। सुबोध स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्हें नहीं पता कि बाबा के दरबार तक पहुँचने में कितना समय लगेगा, लेकिन उनका संकल्प है कि 'यात्रा तब तक जारी रहेगी, जब तक बाबा के चरणों तक नहीं पहुँच जाते।'
आस्था की शक्ति
सुबोध को पूरा भरोसा है कि जिस तरह पिछली दंडवत यात्राओं में बाबा बैद्यनाथ ने उन्हें मंजिल तक पहुँचाया, उसी तरह इस बार भी उनकी राह आसान होगी। मुंगेर और आसपास के क्षेत्रों में उनकी यात्रा की चर्चा है और राह में मिलने वाले श्रद्धालु उनके हौसले को देखकर हैरान रह जाते हैं।
श्रावण मास में बाबाधाम की यात्रा वैसे भी लाखों कांवड़ियों की आस्था का केंद्र होती है, लेकिन सुबोध की यह यात्रा उस आस्था को एक नया आयाम दे रही है — जहाँ शरीर का दर्द भी भक्ति के संकल्प को नहीं तोड़ पाता।