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घुटनों के बल बाबाधाम: लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह की अदम्य आस्था की यात्रा

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घुटनों के बल बाबाधाम: लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह की अदम्य आस्था की यात्रा

सारांश

दर्द से बेपरवाह, घुटनों पर गहरे जख्म लिए — लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह घुटनों के बल चलकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार पहुँचने का संकल्प लेकर निकले हैं। 18 किलोमीटर तय हो चुके हैं, मंजिल अभी दूर है, लेकिन आस्था का यह हठ योग हर राहगीर को रोक देता है।

मुख्य बातें

लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह घुटनों के बल चलकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार देवघर पहुँचने का संकल्प लेकर निकले हैं।
यात्रा 28 जुलाई को सुल्तानगंज से गंगाजल उठाकर शुरू हुई; अब तक 18 किलोमीटर तय।
प्रतिदिन केवल एक से डेढ़ किलोमीटर की गति; दोनों घुटनों की खाल छिल चुकी है और गहरे जख्म हो गए हैं।
सुबोध इससे पहले 9 बार दंडवत यात्रा कर चुके हैं; इस बार घुटनों के बल चलना उनका 'हठ योग' है।
परिवार के विरोध के बावजूद वे अपने बेटे और एक मित्र के साथ यात्रा जारी रखे हुए हैं।

लखीसराय निवासी सुबोध कुमार सिंह इन दिनों बिहार में आस्था और हठ योग की एक अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं — वे घुटनों के बल चलकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार देवघर पहुँचने का संकल्प लेकर निकले हैं। 28 जुलाई को सुल्तानगंज से गंगाजल उठाकर शुरू हुई यह यात्रा अब तक 18 किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी है, जबकि प्रतिदिन केवल एक से डेढ़ किलोमीटर की रफ्तार से यह सफर आगे बढ़ रहा है।

यात्रा का संकल्प और पृष्ठभूमि

सुबोध कुमार सिंह इससे पहले अपने गुरु श्री श्री 108 दयाराम दास जी महाराज के साथ वर्ष 2009 से लेकर अब तक करीब 9 बार दंडवत यात्रा करते हुए बाबाधाम जा चुके हैं। इस बार उनके मन में कुछ अलग करने की प्रेरणा जागी और उन्होंने घुटनों के बल चलकर देवघर पहुँचने का निर्णय लिया।

सुबोध के अनुसार, 'यह यात्रा किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए नहीं है — यह बाबा बैद्यनाथ के प्रति समर्पित एक हठ योग है।' उनका कहना है कि महादेव अंतर्यामी हैं और उनसे कुछ भी छिपा नहीं। जिस तरह धार्मिक कार्य का विचार पहले मन में आता है, उसी प्रकार इस बार घुटनों के बल बाबा के दरबार जाने की प्रेरणा उनके भीतर से उठी।

शरीर पर असर और परिवार का विरोध

यात्रा के शुरुआती दो दिनों में सुबोध ने पाँच से छह किलोमीटर से अधिक दूरी तय की। इसके बाद लगातार जमीन पर घुटनों के बल चलने से दोनों घुटनों की खाल छिल गई, गहरे जख्म हो गए और दर्द बढ़ता गया — फिर भी उन्होंने यात्रा रोकने से इनकार कर दिया।

परिवार ने शुरुआत में इस यात्रा का विरोध किया, लेकिन सुबोध का संकल्प अटल रहा। वे अपने बेटे और एक मित्र को साथ लेकर सुल्तानगंज से निकल पड़े। उनके चेहरे पर दर्द के बावजूद विश्वास साफ झलकता है।

हर कदम एक परीक्षा

सामान्य परिस्थितियों में सुल्तानगंज से देवघर की 105 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा कुछ दिनों में पूरी हो जाती है, लेकिन घुटनों के बल चलने पर यह दूरी हर कदम पर एक नई परीक्षा बन जाती है। सुबोध स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्हें नहीं पता कि बाबा के दरबार तक पहुँचने में कितना समय लगेगा, लेकिन उनका संकल्प है कि 'यात्रा तब तक जारी रहेगी, जब तक बाबा के चरणों तक नहीं पहुँच जाते।'

आस्था की शक्ति

सुबोध को पूरा भरोसा है कि जिस तरह पिछली दंडवत यात्राओं में बाबा बैद्यनाथ ने उन्हें मंजिल तक पहुँचाया, उसी तरह इस बार भी उनकी राह आसान होगी। मुंगेर और आसपास के क्षेत्रों में उनकी यात्रा की चर्चा है और राह में मिलने वाले श्रद्धालु उनके हौसले को देखकर हैरान रह जाते हैं।

श्रावण मास में बाबाधाम की यात्रा वैसे भी लाखों कांवड़ियों की आस्था का केंद्र होती है, लेकिन सुबोध की यह यात्रा उस आस्था को एक नया आयाम दे रही है — जहाँ शरीर का दर्द भी भक्ति के संकल्प को नहीं तोड़ पाता।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन घुटनों के बल 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करने का संकल्प उस परंपरा को एक असाधारण आयाम देता है। यह प्रश्न भी उठता है कि शारीरिक कष्ट को साधना मानने की यह प्रवृत्ति आधुनिक समाज में किस हद तक प्रेरणा है और किस हद तक चिंता का विषय — पर सुबोध के लिए यह रेखा स्पष्ट है: बाबा का दरबार ही उनकी मंजिल है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुबोध कुमार सिंह कौन हैं और वे क्यों चर्चा में हैं?
सुबोध कुमार सिंह बिहार के लखीसराय के निवासी हैं जो घुटनों के बल चलकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार देवघर पहुँचने का संकल्प लेकर 28 जुलाई को सुल्तानगंज से निकले हैं। घुटनों पर गहरे जख्म और असहनीय दर्द के बावजूद यात्रा जारी रखने के उनके हौसले ने उन्हें चर्चा का केंद्र बना दिया है।
सुबोध की यात्रा कहाँ से शुरू हुई और अब तक कितनी दूरी तय हुई है?
यात्रा 28 जुलाई को सुल्तानगंज से गंगाजल उठाकर शुरू हुई और अब तक 18 किलोमीटर की दूरी तय की जा चुकी है। वे प्रतिदिन एक से डेढ़ किलोमीटर की गति से आगे बढ़ रहे हैं।
सुबोध ने इस यात्रा को 'हठ योग' क्यों कहा है?
सुबोध के अनुसार इस यात्रा के पीछे कोई विशेष मनोकामना नहीं है — यह बाबा बैद्यनाथ के प्रति उनकी आस्था और समर्पण की एक साधना है जिसे वे हठ योग कहते हैं। उनका मानना है कि महादेव अंतर्यामी हैं और यह प्रेरणा उनके भीतर से स्वयं उठी।
क्या सुबोध पहले भी बाबाधाम की विशेष यात्रा कर चुके हैं?
हाँ, सुबोध वर्ष 2009 से अपने गुरु श्री श्री 108 दयाराम दास जी महाराज के साथ दंडवत यात्रा करते आ रहे हैं और अब तक करीब 9 बार दंडवत यात्रा कर चुके हैं। इस बार उन्होंने घुटनों के बल चलने का अलग संकल्प लिया।
परिवार की क्या प्रतिक्रिया रही?
परिवार ने शुरुआत में इस यात्रा का विरोध किया, लेकिन सुबोध का मन नहीं माना। इसके बाद वे अपने बेटे और एक मित्र को साथ लेकर यात्रा पर निकल पड़े।
राष्ट्र प्रेस
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