31 जुलाई 2026
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बिहार के मखाना को मिली वैश्विक पहचान: दरभंगा से 7 मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाना का पहला समुद्री निर्यात कनाडा रवाना

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बिहार के मखाना को मिली वैश्विक पहचान: दरभंगा से 7 मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाना का पहला समुद्री निर्यात कनाडा रवाना

सारांश

दरभंगा की धरती से पहली बार समुद्री मार्ग से 7 मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाना कनाडा रवाना हुआ — बिहार के किसानों को 50% से अधिक बेहतर मूल्य मिल रहा है। यह बिहार के मखाना उद्योग के वैश्विक विस्तार की नई शुरुआत है।

मुख्य बातें

दरभंगा से 7 मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाना का पहला समुद्री निर्यात कनाडा के लिए रवाना किया गया।
यह निर्यात APEDA के प्रयासों से संभव हुआ; इससे जुड़े किसानों को 50 प्रतिशत से अधिक बेहतर मूल्य मिल रहा है।
इससे पहले पूर्णिया से रोस्टेड मखाना का निर्यात दुबई को किया जा चुका है।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने एक्स पर पोस्ट कर इसे बिहार के किसानों के लिए बड़ी उपलब्धि बताया।
बिहार देश के कुल मखाना उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत उत्पादन करता है और GI टैग से वैश्विक ब्रांड पहचान मज़बूत हो रही है।

बिहार के दरभंगा से 7 मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाना (फॉक्स नट्स) का पहला समुद्री निर्यात कनाडा के लिए रवाना किया गया है — जो राज्य के प्रीमियम कृषि उत्पादों को वैश्विक बाज़ारों तक पहुँचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के प्रयासों से संभव हुई यह उपलब्धि भारत के मूल्यवर्धित कृषि निर्यात को नई ऊँचाई देने की रणनीति का हिस्सा है।

मुख्य घटनाक्रम

यह निर्यात खेप दरभंगा से समुद्री मार्ग के ज़रिए कनाडा भेजी गई है। इससे पहले पूर्णिया से रोस्टेड मखाना का निर्यात दुबई को किया जा चुका है, जिसे बिहार के मखाना उद्योग की पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय सफलता माना गया था। अब दरभंगा से साधारण और फ्लेवर्ड मखाना का निर्यात इस यात्रा का अगला पड़ाव है।

गौरतलब है कि बिहार देश के कुल मखाना उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा उपजाता है, फिर भी अब तक इसका अधिकांश व्यापार घरेलू बाज़ार तक सीमित था। यह समुद्री निर्यात उस सीमा को तोड़ने की दिशा में एक निर्णायक प्रयास है।

किसानों को मिल रहा बेहतर मूल्य

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने एक्स पर पोस्ट कर बताया कि वैश्विक बाज़ार तक पहुँच के इस प्रयास से जुड़े किसानों को 50 प्रतिशत से अधिक बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है। उन्होंने इसे बिहार के किसानों के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया और APEDA की भूमिका को रेखांकित किया।

यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार कृषि निर्यात नीति के तहत मूल्यवर्धित उत्पादों — जैसे रोस्टेड, फ्लेवर्ड और पैकेज्ड मखाना — को प्राथमिकता दे रही है, ताकि कच्चे माल की जगह प्रसंस्कृत उत्पाद विदेश जाएँ और किसानों को अधिक लाभ मिले।

निर्यातकों की प्रतिक्रिया

पूर्णिया स्थित मखाना निर्यातक मनीष कुमार ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता जताते हुए कहा, 'यह बिहार के लिए गर्व की बात है। हम लोगों ने पूर्णिया से समुद्री मार्ग के ज़रिए दुबई को मखाना निर्यात किया था और अब दरभंगा से भी निर्यात हो रहा है। हर काम धीरे-धीरे ही आगे बढ़ता है।'

उन्होंने आगे कहा कि सरकार युवाओं को अच्छा माहौल दे रही है और फ्लेवर्ड तथा रोस्टेड मखाना जैसे वैल्यू-एडेड उत्पादों का निर्यात लगातार बढ़ता रहे, यही उनकी आशा है। उन्होंने केंद्र सरकार और बिहार सरकार दोनों का आभार व्यक्त किया।

आम जनता और किसानों पर असर

मखाना उत्पादन से जुड़े किसान — जो मुख्यतः मिथिलांचल क्षेत्र के तालाबों और जलाशयों पर निर्भर हैं — इस निर्यात से सीधे लाभान्वित होंगे। बेहतर मूल्य प्राप्ति न केवल उनकी आय बढ़ाएगी, बल्कि मखाना की खेती को व्यावसायिक रूप से अधिक आकर्षक बनाएगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि फ्लेवर्ड और ऑर्गेनिक मखाना की माँग उत्तरी अमेरिका और यूरोप में बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में बिहार का मखाना निर्यात कई गुना बढ़ सकता है।

क्या होगा आगे

निर्यातक और उद्योग संगठन अब यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाज़ारों में भी मखाना की पहुँच बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। APEDA के प्रयासों से मखाना को GI (भौगोलिक संकेत) टैग मिल चुका है, जो वैश्विक स्तर पर 'बिहार मखाना' की ब्रांड पहचान को और मज़बूत करेगा। फ्लेवर्ड और रोस्टेड किस्मों की बढ़ती माँग को देखते हुए मूल्यवर्धित प्रसंस्करण इकाइयों का विस्तार भी प्राथमिकता में है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा निरंतरता की है — 7 मीट्रिक टन एक प्रतीकात्मक शुरुआत है, न कि पैमाने का प्रमाण। बिहार में मखाना प्रसंस्करण अवसंरचना अभी भी सीमित है, और अधिकांश मूल्यवर्धन राज्य के बाहर होता है, जिससे किसानों को मिलने वाला लाभ अपेक्षाकृत कम रहता है। GI टैग और APEDA की सक्रियता सही दिशा में है, परंतु जब तक स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयाँ और निर्यात लॉजिस्टिक्स मज़बूत नहीं होते, 'किसानों को 50% बेहतर मूल्य' का दावा व्यापक रूप से सत्यापित नहीं किया जा सकता।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिहार के मखाना का कनाडा को निर्यात क्यों खास है?
यह पहली बार है जब दरभंगा से समुद्री मार्ग के ज़रिए फ्लेवर्ड मखाना सीधे कनाडा भेजा गया है। यह बिहार के प्रीमियम कृषि उत्पादों की वैश्विक पहुँच का विस्तार करने और मूल्यवर्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इस निर्यात से बिहार के किसानों को क्या फायदा होगा?
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, इस वैश्विक बाज़ार तक पहुँच से जुड़े किसानों को 50 प्रतिशत से अधिक बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है। बेहतर मूल्य प्राप्ति मखाना की खेती को व्यावसायिक रूप से और अधिक आकर्षक बना सकती है।
APEDA की इस निर्यात में क्या भूमिका है?
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने दरभंगा से कनाडा तक इस पहले समुद्री निर्यात को सुगम बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई है। APEDA के प्रयासों से ही मखाना को GI टैग भी मिला है, जो वैश्विक स्तर पर इसकी ब्रांड पहचान मज़बूत करता है।
क्या पहले भी बिहार से मखाना का निर्यात हुआ है?
हाँ, इससे पहले पूर्णिया से रोस्टेड मखाना का निर्यात दुबई को समुद्री मार्ग से किया जा चुका है। दरभंगा से कनाडा का यह निर्यात उसी यात्रा का अगला और बड़ा पड़ाव है।
मखाना निर्यात का भविष्य क्या है?
निर्यातक और उद्योग संगठन अब यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाज़ारों में भी मखाना पहुँचाने की योजना बना रहे हैं। फ्लेवर्ड और ऑर्गेनिक मखाना की बढ़ती वैश्विक माँग को देखते हुए मूल्यवर्धित प्रसंस्करण इकाइयों का विस्तार भी प्राथमिकता में है।
राष्ट्र प्रेस
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