भिखारी ठाकुर की 'बिदेसिया' 109 साल बाद भी प्रासंगिक, भोजपुरी के शेक्सपियर को भारत रत्न की मांग
सारांश
मुख्य बातें
भिखारी ठाकुर की कालजयी रचना 'बिदेसिया' आज भी उतनी ही मार्मिक है जितनी 109 साल पहले थी — जब पति के परदेस जाने की पीड़ा को इन पंक्तियों में पिरोया गया था: 'का से कहूं मैं दरददिया हो रामा, पिया परदेस गए।' आज जब यूपी, बिहार और पूर्वांचल से लाखों युवा रोज़गार की तलाश में घर छोड़ते हैं, तब यह नाटक वैवाहिक जीवन की नाज़ुकता और विरह की गहराई को नए सिरे से परिभाषित करता है।
बिदेसिया: विरह से परे एक सामाजिक दस्तावेज़
'बिदेसिया' केवल पति-पत्नी के बिछोह की कहानी नहीं है — यह वैवाहिक जीवन में समझ, सहनशीलता और प्रेम की अनिवार्यता का पाठ है। आज के दौर में जब रिश्ते छोटी-छोटी बातों पर टूट रहे हैं, यह नाटक उन मूल्यों की याद दिलाता है जो किसी भी दांपत्य की नींव होते हैं।
जब यह नाटक रंगमंच पर प्रस्तुत होता है, तो पत्नी के करुण वियोग को देख दर्शकों की आँखें भर आती हैं। बेरोज़गारी के कारण परदेस जाने की मजबूरी और पीछे छूटी नई-नवेली दुल्हनों की तड़प — यह दृश्य आज भी उतना ही जीवंत है जितना भिखारी ठाकुर के समय था।
भिखारी ठाकुर: एक अनगढ़ हीरे का सफ़र
भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर 1887 को बिहार के सारण (छपरा) जिले के एक गाँव में एक नाई परिवार में हुआ था। वे भोजपुरी के महान लोक कलाकार, कवि, गीतकार, नाटककार, अभिनेता, नर्तक और समाज सुधारक थे।
प्रारंभ में उन्होंने नाई का काम किया, लेकिन रंगमंच की ओर उनका झुकाव अदम्य था। रामलीला के मंचन से शुरुआत करने वाले भिखारी ठाकुर ने परिवार के विरोध के बावजूद भोजपुरी लोकनाट्य को नई ऊँचाई दी। उनकी नाटक मंडली ने बिहार, पूर्वांचल, बंगाल और असम तक प्रदर्शन किए।
प्रख्यात विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें 'अनगढ़ हीरा' कहकर सराहा था। भिखारी ठाकुर ने लौंडा नाच को भी लोकप्रिय बनाया, जिसकी परंपरा आज भी बिहार में जीवित है।
प्रमुख रचनाएँ और महिला-केंद्रित दृष्टि
भिखारी ठाकुर की रचनाओं में महिलाएँ सदैव केंद्र में रहीं। उनकी प्रमुख कृतियों में 'बिदेसिया', 'बेटी-बेचवा', 'गबरघिचोर', 'भाई-विरोध', 'विधवा-विलाप' और 'गंगा-स्नान' शामिल हैं। उन्होंने भोजपुरी भाषा और संस्कृति को वह गरिमा दिलाई जो उसे मिलनी चाहिए थी।
उन्हें 'भोजपुरी का शेक्सपियर' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने प्रेम, विरह, दुख और सामाजिक कुरीतियों को उसी गहराई से चित्रित किया, जैसे शेक्सपियर ने अंग्रेज़ी साहित्य में किया। 10 जुलाई 1971 को उनका निधन हुआ।
भारत रत्न की माँग और कलाकारों की श्रद्धांजलि
हाल के वर्षों में भिखारी ठाकुर को भारत रत्न दिलाने की माँग तेज़ हुई है। भोजपुरी स्टार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद मनोज तिवारी तथा मशहूर गायिका कल्पना पटवारी ने इस माँग को मुखरता से उठाया है। तिवारी ने इस संदर्भ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र भी लिखा है।
भोजपुरी के अन्य दिग्गज — रवि किशन, खेसारी लाल यादव और पवन सिंह — भिखारी ठाकुर को अपना आदर्श मानते हैं। कलाकारों का एकमत है कि भोजपुरी कला को उन्होंने जो योगदान दिया, वह अतुलनीय और अविस्मरणीय है।
आज भी जीवित है विरासत
छपरा (बिहार) में आज भी लौंडा नाच की परंपरा जारी है। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन के अवसर पर दर्शकों के सामने लौंडा नाच का मंचन किया गया। यह इस बात का प्रमाण है कि भिखारी ठाकुर की विरासत केवल इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि जनजीवन में धड़कती है।