कर्नाटक सूखा संकट: BJP के आर. अशोक का आरोप — वित्त विभाग के पत्र ने खुद उजागर किया वित्तीय संकट
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता आर. अशोक ने 22 सितंबर 2026 को सूखे की स्थिति पर विशेष चर्चा के दौरान राज्य की कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने 17 सितंबर के वित्त विभाग के एक आंतरिक पत्र का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सरकार के अपने विभाग ने स्वीकार किया है कि नई योजनाओं और अतिरिक्त उधार की बेहद सीमित गुंजाइश बची है — और यही वित्तीय संकट सूखा राहत के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बन सकता है।
वित्त विभाग के पत्र में क्या है
अशोक के अनुसार, 17 सितंबर के वित्त विभाग के कम्युनिकेशन में यह स्वीकार किया गया है कि लगभग ₹1,000 करोड़ के प्रोजेक्ट बजट से बाहर हैं और जब तक अतिरिक्त संसाधनों की पहचान नहीं होती, नई योजनाओं को वित्त देना कठिन होगा। उन्होंने दावा किया कि राजकोषीय घाटा FRBM फ्रेमवर्क की 3% की सीमा के मुकाबले 2.95% तक पहुँच गया है, जबकि राजस्व घाटा ₹22,952 करोड़ दर्ज किया गया है।
अशोक ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य की बकाया देनदारियाँ GSDP के 24.94% तक पहुँच चुकी हैं, जो 25% की तय सीमा के करीब है — और इससे नए कर्ज लेने की गुंजाइश लगभग समाप्त हो गई है। उनके अनुसार, विभिन्न विभागों के लंबित बिल लगभग ₹2 लाख करोड़ तक पहुँच चुके हैं, जिनमें सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) और जल संसाधन सहित चार विभागों का हिस्सा अकेले ₹36,136 करोड़ है।
सूखे में देरी पर सवाल
अशोक ने तर्क दिया कि अप्रैल 2026 में ही भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने कम बारिश की चेतावनी दी थी, और केंद्र से एल नीनो के संभावित असर के संकेत भी मिले थे। बावजूद इसके, राज्य सरकार ने चार महीने बाद सूखे की आधिकारिक घोषणा की। उन्होंने सवाल किया कि अप्रैल में ही कैबिनेट नोट तैयार होने के बाद इतनी देरी क्यों हुई।
अशोक ने क्लाउड सीडिंग परियोजना की भी आलोचना की और दावा किया कि मौसम विभाग की चेतावनी के बावजूद इस पर ₹28 करोड़ खर्च किए गए, किंतु किसानों को कोई लाभ नहीं मिला। उन्होंने बताया कि 4 सितंबर तक 84.10 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 67.32 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो सकी।
राहत उपायों की माँग
विपक्ष के नेता ने सरकार से कई तत्काल माँगें रखीं — खेती का कर्ज माफ करना, ₹50,000 प्रति एकड़ मुआवजा देना, निजी साहूकारों को विनियमित करना, ग्रामीण योजनाओं के तहत रोजगार देना, चारे का पर्याप्त भंडार सुनिश्चित करना, पशु आश्रय बनाना, झीलों से गाद निकालना और बोरवेल पर लगी रोक में जरूरत के अनुसार ढील देना।
अशोक ने यह भी माँग की कि पलायन कर चुके परिवारों को सहायता और उनके बच्चों को शिक्षा सुविधा मिले, साथ ही प्रस्तावित ₹5,000 करोड़ के प्राकृतिक आपदा कोष को तुरंत लागू किया जाए। उन्होंने यह भी बताया कि कर्नाटक में करीब 37 लाख बोरवेल हैं, और सरकार से पूछा कि इनमें से कितने वास्तव में काम कर रहे हैं।
आम जनता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक के कई ज़िलों में सूखे की स्थिति गंभीर है और ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी, चारे और रोजगार की किल्लत बढ़ रही है। अशोक का कहना है, "प्राकृतिक सूखे से तभी निपटा जा सकता है जब सरकार में कोई वित्तीय सूखा न हो" — यह बयान सीधे तौर पर यह इशारा करता है कि राज्य की खस्ता आर्थिक हालत राहत कार्यों की रफ्तार पर असर डाल सकती है।
गौरतलब है कि चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में ₹5,000 करोड़ से अधिक के कार्यों को मंजूरी दी गई है, जो बजटीय दबाव को और बढ़ाता है। राज्य सरकार ने अभी तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।