भाजपा 'बदले की राजनीति' छोड़े, 'बदलाव की राजनीति' अपनाए: कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने 17 मई को लखनऊ में पश्चिम बंगाल में 'बिस्वा बांग्ला' लोगो हटाने, भोजशाला विवाद और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा कक्षा 9 में तीन भाषाएँ अनिवार्य करने के फैसले पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP असली जन-समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए प्रतीकात्मक और सांप्रदायिक राजनीति का सहारा ले रही है।
बिस्वा बांग्ला लोगो विवाद
पश्चिम बंगाल में 'बिस्वा बांग्ला' लोगो हटाकर उसकी जगह अशोक स्तंभ लगाए जाने के मुद्दे पर राजपूत ने कहा कि BJP को 'बदले की राजनीति' छोड़कर 'बदलाव की राजनीति' करनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर 'बिस्वा बांग्ला' लोगो में ऐसा क्या आपत्तिजनक था, जिसे हटाने की ज़रूरत पड़ी। राजपूत ने यह भी आरोप लगाया कि BJP केवल प्रतीकों की राजनीति करती है और क्षेत्र में उसके कार्यकर्ताओं ने डर व आतंक का माहौल बना रखा है।
भोजशाला विवाद और सांप्रदायिक राजनीति का आरोप
भोजशाला परिसर में उच्च न्यायालय के आदेश के बाद हिंदुओं को प्रवेश देने के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि BJP शासित राज्यों की सरकारें युवाओं को रोज़गार देने और महंगाई नियंत्रित करने में विफल रही हैं। उन्होंने कहा, 'बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए धार्मिक मुद्दों को हवा दी जा रही है।'
राजपूत ने कहा कि भोजशाला मामला अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच रहा है, इसलिए सभी पक्षों को शीर्ष अदालत के फैसले का इंतज़ार करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम या सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश का विरोध होना चाहिए।
नई शिक्षा नीति और तीन भाषाओं का विवाद
NEP के तहत CBSE द्वारा कक्षा 9 में तीन भाषाएँ अनिवार्य करने के निर्णय पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई। राजपूत ने कहा कि शिक्षा नीति में किसी भी बदलाव से पहले व्यापक चर्चा होनी चाहिए और ऐसे फैसलों पर संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह बहस हो तथा शिक्षा विशेषज्ञों से खुली चर्चा के बाद ही निर्णय लिया जाए।
लोकतांत्रिक परंपरा पर सवाल
राजपूत ने आरोप लगाया कि BJP सरकार के आने के बाद लोकतांत्रिक चर्चाओं की परंपरा कमज़ोर हुई है और फैसले एकतरफा तरीके से लिए जा रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल केंद्र सरकार पर संसदीय प्रक्रियाओं को दरकिनार करने के आरोप लगाते रहे हैं। गौरतलब है कि भोजशाला और भाषा नीति जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक बहस का केंद्र बने रह सकते हैं।