पश्चिम बंगाल चुनाव: भाजपा का 'जय मां काली' नैरेटिव भारी, टीएमसी का 'हृदय माछे काबा' नारा बैकफायर
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का 'काली बनाम काबा' का सांस्कृतिक नैरेटिव तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 'हृदय माछे काबा, नयन-ए-मदीना' लोकगीत पर भारी पड़ गया। 4 मई को आए मतगणना के रुझानों ने स्पष्ट कर दिया कि धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को केंद्र में रखकर बनाए गए इस नैरेटिव ने राज्य की जनता के मतदान को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।
विवादित गाने से शुरू हुई राजनीतिक सरगर्मी
बांग्लादेश के प्रसिद्ध कवि अब्दुल रहमान बोयाती — जो अविभाजित बंगाल में पैदा हुए थे — का लोकगीत 'हृदय माछे काबा, नयन-ए-मदीना' इस चुनाव के केंद्र में आ गया। अभिनेत्री से नेता बनीं सयानी घोष ने चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम बहुल इलाकों में रैलियों में यह लोकगीत गाकर राजनीतिक सनसनी फैला दी। इस पर पूरे चुनाव अभियान के दौरान तीखी राजनीतिक बहस छिड़ी रही। उल्लेखनीय है कि यही गाना दुर्गा पूजा के पंडाल में ममता बनर्जी की उपस्थिति में भी गाया गया था, जिसके बाद से यह विवाद और गहरा हो गया था।
भाजपा की 'काली बनाम काबा' रणनीति
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा के स्टार प्रचारकों ने इस गाने को 'काली बनाम काबा' के रूप में पश्चिम बंगाल की जनता के सामने पेश किया। उनका तर्क था कि टीएमसी के दिल में काबा-मदीना हो सकता है, लेकिन बंगाल की आत्मा में मां काली और मां दुर्गा का वास है। भाजपा ने 'जय श्री राम' के साथ-साथ 'जय मां काली' के नारे को भी प्रमुखता से आगे बढ़ाया और टीएमसी पर तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाता रहा।
भाजपा ने यह भी आरोप लगाया कि 'बंगाली अस्मिता' की बात करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी वास्तव में काबा और मदीना को बंगाल पर थोपने का प्रयास कर रही है। आलोचकों का कहना है कि इस नैरेटिव ने राज्य के हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
माछ-भात से महिला सुरक्षा तक — बहुआयामी चुनावी मुद्दे
बंगाली पहचान का अभिन्न हिस्सा 'माछ और भात' भी इस चुनाव में राजनीतिक हथियार बना। पुरुलिया में एक सभा के दौरान ममता बनर्जी ने कहा था, ''अगर भाजपा सत्ता में आई, तो वे आपको मछली, मांस और अंडा नहीं खाने देंगे। भाजपा एक 'शाकाहारी संस्कृति' वाली पार्टी है, जो माछ-भात बंगाली की अस्मिता को खत्म करना चाहती है।'' भाजपा ने इस वार का जवाब देते हुए 'शाक्त परंपरा' (शक्ति की पूजा) का दामन थामा। अनुराग ठाकुर और मनोज तिवारी जैसे नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मछली खाकर यह संदेश दिया कि वे बंगाली संस्कृति के विरोधी नहीं हैं। कई क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों ने हाथ में मछली लेकर जुलूस निकाला।
महिला मतदाताओं को साधने की होड़ में टीएमसी ने 'लक्ष्मीर भंडार' योजना के तहत महिलाओं को मिलने वाली राशि फरवरी में ₹1,000 से बढ़ाकर ₹1,500 प्रति माह कर दी। भाजपा ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए सत्ता में आने पर महिलाओं को ₹3,000 प्रति माह, सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा और सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया।
इसके अलावा, संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने राज्य सरकार की महिला सुरक्षा की छवि को प्रभावित किया। भाजपा ने संदेशखाली आंदोलन की प्रमुख चेहरा रेखा पात्रा को हिंगलगंज सीट से और आरजी कर मामले में पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को पानीहाटी सीट से चुनावी मैदान में उतारा।
वोटर लिस्ट और अमित शाह का 'पन्ना प्रमुख' मॉडल
इस चुनाव का सबसे बड़ा प्रशासनिक पहलू वोटर लिस्ट में हुआ बदलाव रहा। राज्य में पहले 7.66 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर थे, लेकिन स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के बाद करीब 91 लाख वोटरों के नाम सूची से हटाए गए और कुल संख्या घटकर 6.75 करोड़ रह गई — यानी लगभग 11.8 प्रतिशत की कमी।
गृह मंत्री अमित शाह ने लगभग 15 दिन तक बंगाल में कैंप कर लगातार रैलियाँ, रोड शो और बैठकें कीं। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बूथों को मजबूत, मध्यम और कमजोर श्रेणियों में बाँटा, जिसमें खास ध्यान उन मध्यम बूथों पर रहा जहाँ पिछली बार जीत-हार का अंतर बेहद कम था। उत्तर प्रदेश में सफल 'पन्ना प्रमुख' मॉडल को इस बार बंगाल में भी लागू किया गया। साथ ही यह संदेश भी दिया गया कि मुख्यमंत्री बंगाल का ही होगा।
गंगा के रास्ते सत्ता तक भाजपा का सफर
बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद जश्न के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ''गंगा जी बिहार से होकर बंगाल तक बहती हैं। बिहार की जीत ने पश्चिम बंगाल में विजय का रास्ता खोल दिया है।'' आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड से उत्तर प्रदेश, बिहार और अब पश्चिम बंगाल तक — गंगा के पूरे मार्ग पर भाजपा ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है।
2011 से लगातार 15 साल की सत्ता के कारण उपजी सत्ता-विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोपों से निपटने के लिए भाजपा ने इस बार व्यक्तिगत हमलों की जगह पूरे सिस्टम और 'सिंडिकेट राज' को निशाने पर लिया। मतगणना के रुझानों ने स्पष्ट कर दिया कि ये सभी कारक भाजपा के पक्ष में काम किए और 'जय मां काली' का नारा 'हृदय माछे काबा, नयन-ए-मदीना' पर भारी पड़ गया।