कर्नाटक हाईकोर्ट ने BJP नेता हत्याकांड में पूर्व कांग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी की अपील पर CBI से जवाब तलब किया
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक उच्च न्यायालय की अवकाशकालीन खंडपीठ ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता और जिला पंचायत सदस्य योगेश गौड़ा की हत्या के मामले में पूर्व कांग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी की अपील याचिका पर 7 मई को अभियोजन पक्ष से जवाब माँगा। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 26 मई तक के लिए स्थगित कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
15 जून 2016 को धारवाड़ शहर के एक जिम में योगेश गौड़ा की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। गौड़ा ने कुलकर्णी को राजनीतिक चुनौती दी थी, और यह प्रतिद्वंद्विता हिंसक परिणति को पहुँची। राज्य सरकार ने इस मामले की जाँच केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी थी। आरोपों के सामने आने के समय कुलकर्णी मंत्री और जिला प्रभारी मंत्री के पद पर कार्यरत थे।
दोषसिद्धि और विधायक पद का रद्द होना
कुलकर्णी को 2020 में गिरफ्तार किया गया और 2021 में जमानत पर रिहा किया गया। बाद में उन पर गवाहों को प्रभावित करने का आरोप लगा, जिसके बाद CBI ने जमानत शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए उनकी जमानत रद्द करने की माँग की। अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए जमानत रद्द कर दी। दोषसिद्धि के बाद 15 अप्रैल को उनका विधायक पद भी रद्द कर दिया गया। मामले में उन्हें अभियुक्त संख्या 15 के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
हाईकोर्ट में सुनवाई का घटनाक्रम
यह मामला न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम और न्यायमूर्ति राजेश राय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष आया। कुलकर्णी ने आजीवन कारावास की सजा को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने और जमानत की माँग की है। CBI के वकील ने याचिका पर आपत्तियाँ दर्ज करने के लिए अतिरिक्त समय माँगा, जिसे पीठ ने स्वीकार करते हुए सुनवाई 26 मई तक स्थगित कर दी।
अन्य अभियुक्तों की स्थिति
इसी मामले में एक अन्य आरोपी चंद्रशेखर इंडी ने भी अपील दायर की है। सात वर्ष की कैद की सजा पाए पुलिस सर्कल इंस्पेक्टर चन्नाकेशवा टिंगारिकर के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल पर केवल जमानती अपराधों का आरोप है, इसलिए उन्हें कारावास की सजा नहीं दी जानी चाहिए। सूत्रों के अनुसार, पीठ ने टिंगारिकर की याचिका पर अलग से सुनवाई का निर्णय लेते हुए उनका मामला 14 मई तक के लिए स्थगित किया।
आगे क्या होगा
अब सभी पक्षों की निगाहें 26 मई की सुनवाई पर टिकी हैं, जब CBI अपनी आपत्तियाँ दर्ज करेगी और अदालत यह तय करेगी कि आजीवन कारावास की सजा पर रोक लगाई जाए या नहीं। यह मामला कर्नाटक में राजनीतिक हिंसा और न्यायिक जवाबदेही के व्यापक प्रश्नों को एक बार फिर सामने ला रहा है।