एसआईआर विवाद: बृजभूषण शरण सिंह बोले — 'फारूक अब्दुल्ला की मानसिकता गलत', मतदाता सूची कटौती पर दिया स्पष्टीकरण
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने 3 नवंबर 2026 को गोंडा में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े विवाद पर मुखर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला के बयान को 'गलत मानसिकता' का परिचायक बताया और गृह मंत्री अमित शाह के एसआईआर संबंधी बयान की व्याख्या की।
विवाद की पृष्ठभूमि
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के दौरान देशभर में तीन करोड़ घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उत्तर प्रदेश में एक करोड़ से अधिक हिंदुओं के नाम भी सूची से काटे गए। इस बयान पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने सवाल उठाते हुए कहा था कि 'क्या वे पाकिस्तानी हैं?'
बृजभूषण का पलटवार
बृजभूषण शरण सिंह ने फारूक अब्दुल्ला को 'पुराने और अनुभवी नेता' तो माना, लेकिन कहा कि उनका 'सोचने का तरीका सही नहीं है और उनकी मानसिकता गलत है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम काटने की प्रक्रिया धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि दोहरी या तिहरी प्रविष्टियों के आधार पर की गई है।
मुख्य स्पष्टीकरण: कुल कटौती का विवरण
पूर्व सांसद ने बताया कि देशभर में कुल तेरह करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इनमें से तीन करोड़ ऐसे मतदाता थे जो बांग्लादेश या अन्य देशों से आए हुए घुसपैठियों के रूप में चिह्नित किए गए। शेष नौ से दस करोड़ नाम उन लोगों के थे जिनका नाम एक साथ दो या तीन जगहों पर दर्ज था — जैसे अपने गाँव में, निकट के कस्बे में, जिला मुख्यालय में और व्यवसाय के कारण दिल्ली में भी।
उन्होंने जोर देकर कहा कि उत्तर प्रदेश में काटे गए एक करोड़ हिंदुओं के नाम भी इसी श्रेणी — यानी एकाधिक स्थानों पर दर्ज नाम — में आते हैं, न कि धार्मिक आधार पर।
प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बल
बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि यह संपूर्ण प्रक्रिया 'पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष है।' उनके अनुसार, जिन लोगों के नाम दो या तीन जगह मतदाता सूची में थे, केवल उन्हीं के नाम काटे गए — चाहे वे किसी भी धर्म या समुदाय के हों। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों ने SIR प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
आगे की स्थिति
SIR को लेकर राजनीतिक बहस थमने के आसार फिलहाल कम हैं। विपक्षी नेताओं द्वारा इस मुद्दे को संसद और राज्य विधानसभाओं में उठाए जाने की संभावना बनी हुई है। चुनाव आयोग (ECI) की ओर से अभी तक विस्तृत श्रेणीवार आँकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, जिससे विवाद और गहरा हो सकता है।