बेलडांगा हिंसा में एनआईए जांच जारी रहेगी? कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से माँगा स्पष्ट जवाब
सारांश
मुख्य बातें
कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में जनवरी 2026 में हुई हिंसा की राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) द्वारा की जा रही जाँच पर अपना आधिकारिक रुख अगले सप्ताह तक स्पष्ट करे। अदालत के समक्ष केंद्रीय प्रश्न यह है कि राज्य की नई सरकार एनआईए की जाँच जारी रहने देगी या सर्वोच्च न्यायालय में पूर्व की चुनौती को आगे बढ़ाएगी।
मुख्य घटनाक्रम
चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की डिवीजन बेंच ने बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई की। राज्य सरकार के वकील ने बेंच को बताया कि सरकार सैद्धांतिक रूप से एनआईए जाँच के विरुद्ध नहीं है, किंतु यह स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त समय चाहती है कि इस प्रकरण में गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), 1967 की धाराएँ लागू होंगी या नहीं। बेंच ने राज्य को अगले सप्ताह तक अपनी लिखित राय प्रस्तुत करने का आदेश दिया।
पृष्ठभूमि: बेलडांगा हिंसा क्यों भड़की
इस साल जनवरी 2026 में पड़ोसी राज्य झारखंड में एक प्रवासी मजदूर की मौत की खबर बेलडांगा पहुँचने के बाद तनाव चरम पर पहुँच गया। स्थानीय प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि झारखंड में धार्मिक और भाषाई आधार पर उस मजदूर की पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) की गई। विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया — रेल और सड़क मार्ग जाम किए गए, और जब पुलिस ने नाकेबंदी हटाने की कोशिश की तो प्रदर्शनकारियों ने घात लगाकर हमला किया। कुछ पत्रकार भी इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए। हालाँकि बाद में झारखंड पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए उस मौत को आत्महत्या का मामला बताया।
सुप्रीम कोर्ट की चुनौती और नई सरकार की दुविधा
गौरतलब है कि जब एनआईए ने इस वर्ष की शुरुआत में बेलडांगा मामले की जाँच अपने हाथ में ली, तो तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार ने इस कदम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। अब पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार के सामने यह निर्णायक सवाल है कि वह उस याचिका को वापस लेगी या उसे आगे बढ़ाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य और केंद्र के बीच जाँच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर तनाव का एक व्यापक पैटर्न देखा जाता रहा है।
यूएपीए लागू होगा या नहीं — अहम कानूनी सवाल
इस मामले की कानूनी जटिलता का केंद्र यूएपीए, 1967 की प्रयोज्यता है। यदि अदालत या सरकार यह मान लेती है कि हिंसा में यूएपीए की धाराएँ लागू होती हैं, तो एनआईए की जाँच का अधिकार स्वतः मजबूत हो जाता है। राज्य सरकार की इस बिंदु पर स्थिति अभी अनिश्चित है और अगले सप्ताह की सुनवाई में यही निर्णायक होगा।
आगे क्या होगा
कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच अगले सप्ताह राज्य सरकार का जवाब सुनेगी, जिसके आधार पर यह तय होगा कि एनआईए जाँच निर्बाध जारी रहेगी या उसे कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ेगा। इस मामले का परिणाम भविष्य में केंद्रीय जाँच एजेंसियों और राज्य सरकारों के बीच अधिकार क्षेत्र संबंधी विवादों के लिए एक मिसाल बन सकता है।