सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने की माँग: इंडी गठबंधन अगले दो हफ्तों में राज्यसभा में लाएगा संशोधित नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
इंडी गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए नए सिरे से मुहिम तेज़ कर दी है। कांग्रेस की पहल पर विपक्षी दलों ने एकजुट होकर अगले दो सप्ताह के भीतर राज्यसभा में संशोधित नोटिस सौंपने पर सहमति बना ली है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इस नए नोटिस में हालिया घटनाक्रमों और ताज़े तथ्यों को विशेष रूप से शामिल किया जाएगा।
पृष्ठभूमि: अप्रैल का नोटिस और बदली समीकरण
विपक्ष ने इससे पहले 24 अप्रैल 2026 को राज्यसभा में सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए पहला नोटिस दिया था। उस नोटिस पर विपक्ष के 73 सांसदों के हस्ताक्षर थे और वह अभी भी लंबित है।
हालाँकि, बाद में नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले सात सांसद पाला बदल चुके हैं, जिससे विपक्ष का संख्याबल कमज़ोर हुआ। यही वजह है कि अब नए सिरे से समर्थन जुटाकर संशोधित नोटिस लाने की रणनीति बनाई गई है।
सीडब्ल्यूसी में चर्चा, हस्ताक्षर जुटाने की प्रक्रिया शुरू
सूत्रों के मुताबिक, इस मुद्दे पर कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में विस्तृत चर्चा हो चुकी है। इसके बाद इंडी गठबंधन के विभिन्न दलों के नेताओं से हस्ताक्षर जुटाने का काम शुरू किया गया है। गौरतलब है कि राज्यसभा में इस प्रकार का नोटिस देने के लिए संसद का सत्र चलना अनिवार्य नहीं होता।
राज्यसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। कांग्रेस का दावा है कि यह संख्या जुटाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
चुनाव आयुक्तों के आरोप: विपक्ष का प्रमुख आधार
विपक्ष के नए नोटिस की नींव काफ़ी हद तक चुनाव आयोग के भीतर के विवाद पर टिकी है। आरोप है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार के दोनों सहयोगी चुनाव आयुक्तों ने यह आरोप लगाया है कि कई बार उनसे बिना पूछे या बिना सहमति लिए ही अहम फ़ैसले लिए गए।
विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं और इन्हीं मुद्दों को नए नोटिस में प्रमुखता से उठाया जाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कई राज्यों में चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक तनाव बना हुआ है।
आगे क्या होगा
अगले दो सप्ताह में संशोधित नोटिस दाखिल होने के बाद राज्यसभा के सभापति को इस पर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत निर्णय लेना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्ताव स्वीकृत भी हो जाए, तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बहुमत के कारण इसके पारित होने की संभावना फ़िलहाल नहीं दिखती।
फिर भी, विपक्ष इस मुहिम को चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर बड़े सार्वजनिक बहस के रूप में आगे ले जाना चाहता है। आने वाले दिनों में इंडी गठबंधन के नेताओं के बयान और बढ़ने की संभावना है।