सेंट्रल विस्टा: केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कृषि भवन की मस्जिद हटाने की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने 3 नवंबर 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर कृषि भवन परिसर में स्थित कदीमी मस्जिद को हटाने की माँग की है। सरकार का तर्क है कि सेंट्रल विस्टा रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत प्रस्तावित कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग 4 और 5 के निर्माण में यह मस्जिद बाधा बन रही है और यह सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के भी विपरीत है।
मुख्य घटनाक्रम
दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने स्पष्ट रुख अपनाया है कि किसी भी केंद्रीय सरकारी कार्यालय परिसर की सीमा के भीतर स्थायी धार्मिक ढाँचे को स्थापित करना, बनाए रखना या उस पर दावा करना अस्वीकार्य है। सरकार के अनुसार, यह सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के प्रतिकूल है।
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि कृषि भवन और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट कॉम्प्लेक्स विशेष रूप से सरकारी, प्रशासनिक और जनसेवा कार्यों के लिए समर्पित धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक परिसर हैं। ऐसे में इन परिसरों के भीतर धार्मिक ढाँचे को बनाए रखना उचित नहीं है।
सेंट्रल विस्टा से जुड़ी ज़रूरत
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि सीसीएस बिल्डिंग 4 और 5 का निर्माण सेंट्रल विस्टा मास्टर प्लान का अभिन्न अंग है, जिसे राष्ट्रीय महत्व की सर्वोपरि जन परियोजना बताया गया है। इस परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए प्रोजेक्ट साइट पर मौजूद मस्जिद को हटाना आवश्यक है।
गौरतलब है कि सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत केंद्र सरकार कई पुराने भवनों को हटाकर नए सेक्रेटेरिएट भवनों का निर्माण कर रही है, और कृषि भवन परिसर भी इसी पुनर्विकास के दायरे में शामिल है।
वैकल्पिक नमाज़ स्थल का तर्क
केंद्र ने हलफनामे में यह भी उल्लेख किया कि कृषि भवन के 2 किलोमीटर के दायरे में शाही मस्जिद जाब्तागंज स्थित है, जो आसपास के किसी भी व्यक्ति को नमाज़ की पूरी सुविधा देने में सक्षम है। इस आधार पर सरकार ने तर्क दिया कि परिसर के भीतर अलग से मस्जिद की आवश्यकता नहीं है।
सरकार ने स्पष्ट किया कि उसे कृषि भवन परिसर या सेंट्रल सेक्रेटेरिएट परिसर के भीतर इस मस्जिद के लिए कोई वैकल्पिक स्थान आवंटित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सरकार का मानना है कि सार्वजनिक प्रशासनिक क्षेत्र में धार्मिक स्थल के लिए अलग से जगह देना धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।
व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पहले से ही विभिन्न कानूनी और सामाजिक विमर्शों के केंद्र में है। इससे पहले भी इस परियोजना के कई चरणों को अदालतों में चुनौती दी जा चुकी है, और न्यायपालिका ने प्रत्येक मामले में स्वतंत्र रूप से निर्णय लिया है।
यह कम-से-कम दूसरी बड़ी घटना है जब सेंट्रल विस्टा निर्माण किसी धार्मिक या सांस्कृतिक संरचना के विस्थापन के प्रश्न से जुड़ा है। अब दिल्ली उच्च न्यायालय तय करेगा कि केंद्र सरकार के तर्क कानूनी कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं।
आगे क्या होगा
मामला अब दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। अदालत के अगले आदेश पर सभी की निगाहें टिकी हैं — विशेष रूप से इस पर कि क्या मस्जिद की 'स्थायी धार्मिक संरचना' वाली स्थिति पर कोई अंतरिम निर्देश जारी होता है। परियोजना की समयसीमा को देखते हुए यह मुकदमा सेंट्रल विस्टा के विस्तृत कार्यान्वयन को प्रभावित कर सकता है।