दिल्ली की 7 सरकारी कॉलोनियों का पुनर्विकास: 21 हजार नए फ्लैट बिना टैक्सपेयर्स के पैसे के
सारांश
Key Takeaways
- दिल्ली की सात सरकारी कॉलोनियों का पुनर्विकास किया जा रहा है।
- प्रोजेक्ट में 21 हजार नए फ्लैट बनाए जाएंगे।
- यह योजना सेल्फ-फाइनेंसिंग मॉडल पर आधारित है।
- उद्घाटन 8 फरवरी को होगा।
- कुल लागत लगभग 32,800 करोड़ रुपए है।
नई दिल्ली, 7 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। केंद्र सरकार दिल्ली में स्थित सात पुरानी सरकारी आवासीय कॉलोनियों का व्यापक पुनर्विकास करने जा रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना की विशेषता यह है कि इसे एक अनूठे सेल्फ-फाइनेंसिंग मॉडल के अंतर्गत लागू किया जा रहा है, जिसमें सरकारी खजाने या करदाताओं के पैसे का उपयोग नहीं किया जाएगा।
जिन कॉलोनियों का पुनर्विकास किया जा रहा है, उनमें सरोजिनी नगर, नेताजी नगर, नौरोजी नगर, कस्तूरबा नगर, त्यागराज नगर, श्रीनिवासपुरी और मोहम्मदपुर शामिल हैं। लगभग 537 एकड़ में फैली इन कॉलोनियों में कई आवासीय क्वार्टर काफी पुराने और जर्जर हो चुके थे। इनमें से लगभग 40 प्रतिशत मकानों को रहने के लिए असुरक्षित मान लिया गया था। साथ ही, केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 20 हजार से अधिक घरों की कमी भी महसूस की जा रही थी। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने इन कॉलोनियों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने का निर्णय लिया है।
इस पुनर्विकास परियोजना के तहत पुराने लो-राइज भवनों को हटाकर उनकी जगह आधुनिक हाई-राइज आवासीय कॉम्प्लेक्स का निर्माण किया जाएगा। इस योजना के पूरा होने पर 21 हजार से अधिक नए फ्लैट उपलब्ध होंगे। साथ ही, बेहतर सड़कें, सार्वजनिक सुविधाएं और आधुनिक बुनियादी ढांचा भी विकसित किया जाएगा।
इस परियोजना के तहत 8 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2,722 नए बने फ्लैटों का उद्घाटन किया जाएगा। इसके साथ ही, वे जनरल पूल रेजिडेंशियल एकोमोडेशन पुनर्विकास योजना के अंतर्गत 6,632 नए फ्लैटों की आधारशिला भी रखेंगे। ये फ्लैट सरोजिनी नगर, नेताजी नगर, कस्तूरबा नगर और श्रीनिवासपुरी में बनाए जाएंगे। इस परियोजना की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका सेल्फ-सस्टेनिंग वित्तीय मॉडल है। सरकार ने करदाताओं के पैसे का उपयोग करने के बजाय परियोजना क्षेत्र के एक छोटे हिस्से को व्यावसायिक और आवासीय उपयोग के लिए विकसित करने और उसका मुद्रीकरण (मॉनेटाइजेशन) करने की योजना बनाई है।
परियोजना के कुल क्षेत्रफल का केवल 69.41 एकड़, यानी लगभग 12.9 प्रतिशत हिस्सा व्यावसायिक और आवासीय विकास के लिए निर्धारित किया गया है। इस सीमित भूमि के मॉनेटाइजेशन से लगभग 35,100 करोड़ रुपए की आय होने का अनुमान है। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 32,800 करोड़ रुपए बताई गई है। ऐसे में भूमि मॉनेटाइजेशन से प्राप्त राशि से पूरा खर्च वहन किया जाएगा और इसके बाद भी सरकार को लगभग 2,300 करोड़ रुपए से अधिक का अतिरिक्त लाभ मिलने की संभावना है।
सरकार का कहना है कि यह मॉडल शहरी पुनर्विकास के क्षेत्र में एक नया उदाहरण पेश करता है, जिससे बिना सरकारी बजट पर बोझ डाले बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। साथ ही, इससे सरकारी कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और आधुनिक आवास उपलब्ध कराने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।