दिल्ली में वायु प्रदूषण कम करने के लिए आईआईटी मद्रास के साथ दिल्ली सरकार का महत्वपूर्ण समझौता

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दिल्ली में वायु प्रदूषण कम करने के लिए आईआईटी मद्रास के साथ दिल्ली सरकार का महत्वपूर्ण समझौता

सारांश

दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अगुवाई में दिल्ली सरकार ने आईआईटी मद्रास के साथ एक समझौता किया है। यह अध्ययन फोटोकेटलिटिक तकनीकों के माध्यम से प्रदूषण को कम करने की संभावनाओं पर केंद्रित है।

Key Takeaways

  • दिल्ली सरकार और आईआईटी मद्रास के बीच समझौता
  • फोटोकेटलिटिक तकनीकों का अध्ययन
  • दिल्ली में वायु प्रदूषण कम करने का प्रयास
  • टाइटेनियम डाइऑक्साइड के उपयोग की संभावना
  • सड़कें और इमारतें प्रदूषण को कम करने में मदद करेंगी

नई दिल्ली, १३ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार ने आज आईआईटी मद्रास के साथ एक महत्वपूर्ण एमओयू पर हस्ताक्षर किए।

इस समझौते के अंतर्गत "फोटोकेटलिटिक स्मॉग-ईटिंग सतहों की प्रभावशीलता पर एक गहन अध्ययन" शुरू किया जाएगा। इस अध्ययन में टाइटेनियम डाइऑक्साइड या इसी तरह के सुरक्षित फोटोकेटलिस्ट के माध्यम से दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने की संभावनाओं का मूल्यांकन किया जाएगा।

एमओयू पर हस्ताक्षर करते समय पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा उपस्थित थे। इस अवसर पर आईआईटी मद्रास के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर सोमनाथ सी. रॉय, जो इस अध्ययन के मुख्य अन्वेषक हैं, भी मौजूद थे। पर्यावरण विभाग एवं दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के वरिष्ठ अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

इस मौके पर मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा, "इस अध्ययन के माध्यम से हम यह जानना चाहते हैं कि सड़कों, इमारतों और अन्य शहर की सतहों पर 'स्मॉग-ईटिंग' कोटिंग्स लगाने के सबसे प्रभावी, टिकाऊ और किफायती तरीके क्या हैं। यदि अध्ययन यह साबित करता है कि ऐसी कोटिंग्स NO2 और अन्य प्रदूषकों को कम कर सकती हैं, तो यह हमारे लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो सकता है।"

सिरसा ने आगे कहा, "दिल्ली की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है और आसपास के क्षेत्रों में तेज़ शहरीकरण हो रहा है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में हमारा लक्ष्य है कि हम लोगों की सुविधा का ध्यान रखते हुए शहर की हवा को साफ रखें। इसलिए, हमें विज्ञान का सहारा लेकर अपनी हवा की रक्षा करनी होगी, ताकि विकास भी जारी रहे और लोगों का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहे।"

फोटोकेटलिटिक सामग्री जैसे टाइटेनियम डाइऑक्साइड धूप में सक्रिय होकर रासायनिक प्रतिक्रिया प्रारंभ करते हैं, जिससे हानिकारक प्रदूषक कम हानिकारक तत्वों में परिवर्तित हो जाते हैं। इस अध्ययन में देखा जाएगा कि इन सामग्रियों को शहर के ढांचे में कैसे शामिल किया जा सकता है, जैसे कंक्रीट और डामर में मिलाकर, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर कोटिंग के रूप में या छतों एवं स्ट्रीट लाइट्स पर लगाए जाने वाले पैनलों के रूप में।

अध्ययन में टाइटेनियम डाइऑक्साइड आधारित फोटोकेटलिटिक पैनलों के विकास और उपयोग की संभावनाएं भी देखी जाएंगी। इन पैनलों को सोलर पैनलों की तरह छतों या स्ट्रीट लाइट पोल्स पर स्थापित किया जा सकता है, ताकि आसपास की हवा से प्रदूषकों को सीधे हटाया जा सके।

सिरसा ने कहा, "हम नवीनता को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। हमारी इनोवेशन चैलेंज पहल अब परीक्षण चरण में है, और यह अध्ययन उसी प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है।"

प्रोफेसर सोमनाथ सी. रॉय ने अध्ययन की प्रक्रिया के बारे में बताया, "अध्ययन की शुरुआत आईआईटी मद्रास में तैयार किए गए स्मॉग चैम्बर में लैब परीक्षण से होगी, जहां प्रदूषण के कम होने की सटीक माप की जाएगी। इसके बाद हमारी टीम दिल्ली के शहरी वातावरण में वास्तविक फील्ड परीक्षण करेगी, जिसमें कंक्रीट, डामर, धातु के पैनल, कांच और सड़कों जैसी सतहों पर इन तकनीकों की टिकाऊपन और प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जाएगा।"

यह वैज्ञानिक पहल दिल्ली सरकार की बहुआयामी रणनीति का एक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य शहर की वायु गुणवत्ता में सुधार करना है। यह प्रयास रोड डस्ट नियंत्रण सहित अन्य उपायों के साथ मिलकर काम करेगा। अध्ययन के नतीजों के आधार पर सरकार इस वर्ष के पीक स्मॉग महीनों के दौरान इन समाधानों के उपयोग की संभावना भी तलाशेगी, जिससे शहर में बड़े पैमाने पर किफायती और प्रभावी समाधान लागू किए जा सकें।

Point of View

बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए भी आवश्यक है।
NationPress
17/03/2026

Frequently Asked Questions

इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए फोटोकेटलिटिक तकनीकों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करना है।
आईआईटी मद्रास का इस समझौते में क्या योगदान है?
आईआईटी मद्रास इस अध्ययन का मुख्य अन्वेषक है और वह प्रयोगशाला परीक्षण और फील्ड परीक्षण में मदद करेगा।
क्या इस अध्ययन के परिणामों का जनता पर प्रभाव पड़ेगा?
हाँ, यदि अध्ययन सफल होता है, तो इससे दिल्ली की वायु गुणवत्ता में सुधार होगा, जो नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होगा।
क्या यह अध्ययन अन्य शहरों में भी लागू किया जा सकता है?
यदि यह अध्ययन सफल रहता है, तो इसकी तकनीकों को अन्य शहरों में भी लागू किया जा सकता है।
इस अध्ययन की समयावधि कितनी है?
यह अध्ययन लगभग छह महीने तक चलेगा।
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