29 अक्टूबर 2026
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डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बैंक की लापरवाही से साइबर ठगी हुई तो पीड़ित को पूरा मुआवजा अनिवार्य

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डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बैंक की लापरवाही से साइबर ठगी हुई तो पीड़ित को पूरा मुआवजा अनिवार्य

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट मामलों में बैंकों की जवाबदेही पर ऐतिहासिक रुख अपनाया — KYC में लापरवाही हुई तो पूरी ठगी रकम बैंक देगा। RBI के नए नियमों की अदालती समीक्षा के बाद ही अधिसूचना होगी, जो देश में साइबर ठगी के लाखों पीड़ितों के लिए राहत की बड़ी उम्मीद बन सकती है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2026 को डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी मामलों पर सख्त रुख अपनाया।
अदालत का निर्देश — बैंक की KYC लापरवाही से ठगी हुई तो पीड़ित को पूरी ठगी रकम का मुआवजा अनिवार्य।
RBI के प्रस्तावित एंटी-साइबर फ्रॉड नियमों की अदालत खुद समीक्षा करेगी, तभी अधिसूचना होगी।
अटॉर्नी जनरल ने आश्वासन दिया — लापरवाह बैंक कर्मचारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी।
कोर्ट ने रेखांकित किया कि अधिकांश डिजिटल अरेस्ट मामलों में WhatsApp कॉल और वीडियो कॉल का दुरुपयोग हुआ।

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2026 को देशभर में तेज़ी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के प्रस्तावित एंटी-साइबर फ्रॉड नियमों को अधिसूचित करने से पहले अदालत स्वयं उनकी समीक्षा करेगी। अदालत ने निर्देश दिया कि इन नियमों में यह प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल हो कि किसी वित्तीय संस्थान की लापरवाही के कारण यदि धोखाधड़ी होती है, तो वह संस्थान पीड़ित को हुए नुकसान की पूरी भरपाई करे।

अदालत के प्रमुख निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में बैंकों की जवाबदेही तय करना अत्यंत ज़रूरी है। अदालत ने कहा कि ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें पीड़ित के खाते से निकाली गई रकम की भरपाई सीधे बैंक करे, ताकि आम नागरिक को न्याय के लिए दर-दर भटकना न पड़े।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी वित्तीय संस्थान ने KYC जैसी अनिवार्य जाँच-प्रक्रियाओं में लापरवाही बरती और उसके कारण डिजिटल अरेस्ट या साइबर ठगी की घटना हुई, तो वह संस्थान पीड़ित को कम-से-कम ठगी गई पूरी रकम का मुआवजा देने के लिए बाध्य होगा।

अटॉर्नी जनरल का आश्वासन

अदालत की सख्ती को देखते हुए केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित अटॉर्नी जनरल ने भरोसा दिलाया कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी ठगी में जिस भी बैंक कर्मचारी की लापरवाही सामने आएगी, उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी और उसके विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार और RBI मिलकर एक मज़बूत नियामक ढाँचा तैयार कर रहे हैं।

व्हाट्सएप के दुरुपयोग पर चिंता

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि डिजिटल अरेस्ट की लगभग सभी घटनाओं में WhatsApp कॉल और वीडियो कॉल का दुरुपयोग सामने आया है। ठग खुद को पुलिस अधिकारी, CBI या ED का अफसर बताकर लोगों को डराते हैं और उन्हें 'डिजिटल रूप से गिरफ्तार' करने का झूठा दावा करते हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में साइबर ठगी के मामले हर महीने नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं और आम नागरिक, विशेषकर बुज़ुर्ग और कम डिजिटल-साक्षर वर्ग, इन अपराधियों का सबसे आसान निशाना बन रहे हैं। गौरतलब है कि यह पहली बार है जब सर्वोच्च न्यायालय ने RBI के नियमों को अधिसूचित करने से पहले उनकी समीक्षा की शर्त रखी है।

आम जनता पर असर

यदि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप नियम अधिसूचित होते हैं, तो डिजिटल ठगी के शिकार लोगों को नुकसान की वसूली के लिए लंबी कानूनी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी। बैंकों पर सीधी देनदारी तय होने से वित्तीय संस्थानों पर अपनी KYC प्रक्रियाओं और खाता-निगरानी प्रणाली को मज़बूत करने का दबाव बढ़ेगा।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय ने RBI के प्रस्तावित नियमों की समीक्षा के बाद ही उन्हें अधिसूचित करने की अनुमति देने का संकेत दिया है। अदालत की यह सक्रियता साइबर अपराध से निपटने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप है, और आने वाले सत्रों में बैंकिंग जवाबदेही के मानकों पर विस्तृत दिशानिर्देश जारी होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या RBI के नए ढाँचे में इसकी बाध्यकारी संरचना होगी। यह भी ध्यान देने योग्य है कि WhatsApp के दुरुपयोग पर अदालत की टिप्पणी एक बड़े तकनीकी-नियामक शून्य की ओर इशारा करती है — जहाँ विदेशी मंचों की जवाबदेही अभी भी अनिर्धारित है। बिना स्वतंत्र अनुपालन-जाँच और पीड़ित-अनुकूल दावा-प्रक्रिया के, यह ऐतिहासिक आदेश भी कागज़ी राहत बनकर रह सकता है।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट मामलों में क्या निर्देश दिया है?
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि यदि किसी बैंक या वित्तीय संस्थान की KYC या जाँच-प्रक्रिया में लापरवाही के कारण डिजिटल अरेस्ट या साइबर ठगी हुई है, तो वह संस्थान पीड़ित को ठगी गई पूरी रकम का मुआवजा अनिवार्य रूप से दे। अदालत ने RBI के प्रस्तावित नियमों में इस प्रावधान को शामिल करना अनिवार्य बताया।
डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?
डिजिटल अरेस्ट एक साइबर ठगी की तकनीक है जिसमें अपराधी WhatsApp कॉल या वीडियो कॉल के ज़रिए खुद को पुलिस, CBI या ED का अधिकारी बताकर पीड़ित को डराते हैं और उन्हें 'डिजिटल रूप से गिरफ्तार' करने का झूठा दावा कर पैसे ऐंठते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि ऐसे लगभग सभी मामलों में WhatsApp का दुरुपयोग हुआ है।
RBI के एंटी-साइबर फ्रॉड नियमों का क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि RBI के प्रस्तावित एंटी-साइबर फ्रॉड नियमों को अधिसूचित करने से पहले अदालत उनकी समीक्षा करेगी। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि इन नियमों में पीड़ितों को सीधी भरपाई और बैंकों की स्पष्ट जवाबदेही के प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल हों।
बैंक कर्मचारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही कैसे तय होगी?
केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी ठगी में जिस भी बैंक कर्मचारी की लापरवाही सामने आएगी, उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी और उसके विरुद्ध कार्रवाई होगी। सरकार और RBI मिलकर इसके लिए एक मज़बूत नियामक ढाँचा तैयार कर रहे हैं।
साइबर ठगी के शिकार आम नागरिकों को इस फैसले से क्या फायदा होगा?
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप नियम बनने पर डिजिटल ठगी के पीड़ितों को मुआवजे के लिए लंबी अदालती लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी, क्योंकि बैंक पर सीधी देनदारी होगी। इससे बैंकों पर अपनी KYC प्रक्रियाओं और खाता-निगरानी प्रणाली को मज़बूत करने का दबाव भी बढ़ेगा।
राष्ट्र प्रेस
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