20 सितंबर 2026
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डूसू चुनाव 2026: एबीवीपी ने 4 में से 3 पद जीते, एनएसयूआई का सूपड़ा साफ

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डूसू चुनाव 2026: एबीवीपी ने 4 में से 3 पद जीते, एनएसयूआई का सूपड़ा साफ

सारांश

डूसू चुनाव 2026 में एबीवीपी ने 3 पद जीतकर कैंपस पर अपनी मज़बूत पकड़ का प्रदर्शन किया। कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा नेताओं ने इसे विपक्ष के युवा-केंद्रित अभियान पर करारा जवाब बताया — और सवाल उठा कि दिल्ली में चुनाव हों, तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं?

मुख्य बातें

एबीवीपी ने डूसू चुनाव 2026 में 4 में से 3 पद जीते — अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव।
यश डबास अध्यक्ष, रिया छावड़ी सचिव और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव निर्वाचित हुए।
उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन विजयी रहे।
कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई चारों पदों पर पराजित, एक भी सीट नहीं जीती।
समाजवादी छात्र सभा ने पहली बार डूसू चुनाव में भाग लिया।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने जीत को युवाओं के राजनीतिक रुझान का संकेत बताया।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव 2026 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने चार में से तीन प्रमुख पदों पर कब्ज़ा जमाते हुए निर्णायक जीत दर्ज की। 19 सितंबर 2026 को घोषित परिणामों में एबीवीपी के यश डबास अध्यक्ष, रिया छावड़ी सचिव और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव पद पर निर्वाचित हुए। कांग्रेस समर्थित राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) एक भी सीट नहीं जीत सकी।

चुनाव परिणाम: कौन जीता, कौन हारा

उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीत हासिल की, जो एबीवीपी के एकाधिकार को पूरी तरह रोकने वाली एकमात्र बाधा बनी। इस तरह संगठित दलीय लड़ाई में एबीवीपी ने बाज़ी मारी, जबकि एनएसयूआई चारों पदों पर खाली हाथ रही। समाजवादी छात्र सभा ने पहली बार डूसू चुनाव में भागीदारी की, जिसके प्रदर्शन को उसके नेताओं ने उत्साहजनक बताया।

भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने एबीवीपी की जीत को युवाओं के राजनीतिक रुझान का प्रतिबिंब बताया। उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय देशभर के छात्रों का केंद्र है और डूसू को व्यापक छात्र प्रतिनिधित्व का मंच माना जाता है। रिजिजू ने दावा किया कि विपक्ष की ओर से युवाओं के नाम पर चलाए जा रहे राजनीतिक अभियान को इन नतीजों से करारा जवाब मिला है।

लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि छात्रों ने राष्ट्रवाद और विकसित भारत की सोच के समर्थन में मतदान किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी इसी तरह के चुनावी झटकों का सामना करती रहेगी। त्रिपाठी ने राहुल गांधी पर विदेशी एजेंसियों के प्रभाव में काम करने का भी आरोप लगाया, जो एक गंभीर राजनीतिक हमला है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और गांधी स्मृति के उपाध्यक्ष विजय गोयल ने भी एबीवीपी उम्मीदवारों को बधाई दी। गोयल ने कहा कि परिणामों ने यह स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया अभियानों या राजनीतिक दावों की व्याख्या को सीधे छात्र मतदाताओं के फैसले से नहीं जोड़ा जा सकता।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने डूसू में समाजवादी छात्र सभा की पहली भागीदारी को सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया — यदि दिल्ली में छात्रसंघ चुनाव हो सकते हैं, तो उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में क्यों नहीं? मेहरोत्रा ने अपने लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि वहाँ फिलहाल चुनाव नहीं हो रहे।

व्यापक राजनीतिक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय राजनीति में युवा मतदाताओं की प्राथमिकताओं को लेकर बहस जारी है। गौरतलब है कि डूसू चुनाव पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय छात्र राजनीति का बैरोमीटर माना जाता है, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय में देशभर के छात्र अध्ययन करते हैं। एबीवीपी की यह जीत संगठन की कैंपस-स्तरीय पकड़ की निरंतरता को दर्शाती है।

आने वाले दिनों में नवनिर्वाचित छात्रसंघ का एजेंडा और विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ उसका जुड़ाव यह तय करेगा कि क्या यह जनादेश महज़ राजनीतिक संकेत है या ज़मीनी छात्र हितों की वास्तविक आवाज़।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इन्हें राष्ट्रीय युवा राजनीति का अटल प्रमाण मान लेना जल्दबाज़ी होगी — दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र आधार पूरे देश का प्रतिनिधि नमूना नहीं है। एनएसयूआई का शून्य पर सिमटना ज़रूर चिंताजनक है, पर यह कांग्रेस के छात्र संगठनात्मक ढाँचे की कमज़ोरी को दर्शाता है, न कि आवश्यक रूप से युवा मतदाताओं की व्यापक विचारधारात्मक पसंद को। उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय की जीत यह भी संकेत देती है कि कैंपस पर स्थानीय मुद्दे और व्यक्तिगत छवि का वज़न कभी-कभी दलीय पहचान से भारी पड़ सकती है। भाजपा नेताओं के बयानों में जो राजनीतिक ओवरलैप है, वह इस बात की याद दिलाता है कि छात्र चुनावों का उपयोग अक्सर व्यापक राष्ट्रीय कथा गढ़ने के लिए होता है — जो न छात्रों के हित में है, न लोकतांत्रिक भावना में।
RashtraPress
20 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डूसू चुनाव 2026 में कौन-कौन जीता?
एबीवीपी के यश डबास अध्यक्ष, रिया छावड़ी सचिव और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव पद पर निर्वाचित हुए। उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीत दर्ज की।
डूसू चुनाव में एनएसयूआई का प्रदर्शन कैसा रहा?
कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई चारों पदों पर पराजित रही और एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा नेताओं ने इसे कांग्रेस के लिए राजनीतिक संदेश बताया।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने डूसू नतीजों पर क्या कहा?
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने एबीवीपी की जीत को युवाओं के राजनीतिक रुझान का संकेत बताया और कहा कि विपक्ष के युवा-केंद्रित अभियान को इन नतीजों से जवाब मिला है। उन्होंने सभी विजयी उम्मीदवारों और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को बधाई दी।
समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने क्या सवाल उठाया?
सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने सवाल किया कि यदि दिल्ली में छात्रसंघ चुनाव हो सकते हैं, तो उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में क्यों नहीं। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव न होने का उल्लेख करते हुए उत्तर प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों पर रोक का मुद्दा उठाया।
डूसू चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति से क्या संबंध है?
दिल्ली विश्वविद्यालय में देशभर से छात्र पढ़ते हैं, इसलिए डूसू को राष्ट्रीय छात्र राजनीति का बैरोमीटर माना जाता है। भाजपा और एबीवीपी के नेताओं ने इस जीत को राष्ट्रवाद और विकसित भारत की विचारधारा के युवा समर्थन का प्रमाण बताया।
राष्ट्र प्रेस
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