बाल श्रम उन्मूलन और सुरक्षित पलायन पर गांधीनगर में अंतरराज्यीय संवाद, मंत्री बावलिया बोले — यह साझी जिम्मेदारी
सारांश
मुख्य बातें
गांधीनगर के सरदार पटेल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (SPIPA) में 16 जून 2026 को 'बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस' के अवसर पर एक दो दिवसीय अंतरराज्यीय संवाद का आयोजन किया गया। इस संवाद का केंद्रीय उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि प्रवासी मजदूरों के बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बाल संरक्षण प्रणालियों की पहुँच से वंचित न रह जाएं।
उद्घाटन सत्र: मंत्री बावलिया का संबोधन
उद्घाटन सत्र में गुजरात के श्रम, कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री कुंवरजी बावलिया ने कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति के लिए पलायन अनिवार्य है, लेकिन इसके साथ ही यह प्रक्रिया बच्चों को शोषण, तस्करी और बाल श्रम के गंभीर जोखिम में डाल देती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'सुरक्षित पलायन और बाल श्रम को खत्म करना एक सामाजिक, आर्थिक और मानवीय जिम्मेदारी है जिसे हम सभी को मिलकर निभाना होगा।'
बावलिया ने जोर देकर कहा कि श्रम नीति को प्रशासनिक दायरे से आगे बढ़कर हर मजदूर के परिवार और उसके बच्चे तक पहुँचनी चाहिए। उन्होंने प्रवासी मजदूरों को उद्योग, निर्माण, सेवा और कृषि क्षेत्र में विकास की धुरी बताते हुए उन्हें 'राष्ट्र-निर्माण का स्तंभ' कहा।
गुजरात की चुनौतियाँ और सरकारी प्रयास
गुजरात देश के प्रमुख औद्योगिक राज्यों में से एक है और देशभर से लाखों प्रवासी मजदूरों को आकर्षित करता है। मंत्री ने स्वीकार किया कि पलायन की प्रक्रिया अक्सर बच्चों की पढ़ाई में बाधा डालती है, स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच कम करती है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर कर देती है — जो परिस्थितियाँ बाल श्रम और तस्करी को बढ़ावा देती हैं।
बावलिया ने बताया कि राज्य ने बाल एवं किशोर श्रम उन्मूलन के लिए कार्यरत जिला-स्तरीय टास्क फोर्स को मजबूत किया है और बच्चों के बचाव, पुनर्वास तथा मुख्यधारा में वापसी के लिए विभागों के बीच समन्वय बेहतर किया है। इसके अलावा मजदूरों के ऑनलाइन पंजीकरण, जागरूकता अभियानों और सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार करने के प्रयास भी जारी हैं।
विशेषज्ञों और अधिकारियों की राय
गुजरात राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष धर्मिष्ठा गज्जर ने बाल श्रम को केवल कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों, आकांक्षाओं और भविष्य पर सीधा हमला बताया। उन्होंने कहा कि हर बच्चे को सुरक्षित बचपन, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का समान अधिकार है।
लेबर कमिश्नर के.डी. लखानी ने बाल मजदूरी को शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी एक व्यापक सामाजिक समस्या के रूप में देखने की जरूरत पर बल दिया। महात्मा गांधी लेबर इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर जनरल प्रवीण सोलंकी ने कहा कि बाल मजदूरी को व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
यूनिसेफ का दृष्टिकोण
यूनिसेफ के चीफ फील्ड ऑफिस प्रतिनिधि डॉ. नारायण गावकर ने कहा कि गुजरात के औद्योगिक विकास ने अन्य राज्यों से बड़े पैमाने पर प्रवासन को प्रोत्साहित किया है, लेकिन आर्थिक प्रगति बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य या सुरक्षा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि यूनिसेफ वर्षों से सरकारों और संस्थाओं के साथ मिलकर परिवारों को सशक्त बनाने, किशोरों को शिक्षा व कौशल विकास से जोड़ने और स्कूली शिक्षा तक निर्बाध पहुँच सुनिश्चित करने पर काम कर रहा है।
भागीदारी और आगे की राह
इस कार्यशाला में गुजरात, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के प्रतिनिधियों के साथ-साथ नीति-निर्माता, बाल अधिकार संगठन और विषय विशेषज्ञ शामिल हुए। यह संवाद ऐसे समय में आयोजित हुआ जब देश में प्रवासी श्रमिकों की संख्या और उनके बच्चों की सुरक्षा को लेकर नीतिगत बहस तेज हो रही है। आने वाले दिनों में इस संवाद से निकले सुझावों को राज्य-स्तरीय नीतियों में समाहित करने की उम्मीद जताई जा रही है।