उत्तर प्रदेश का गो संरक्षण मॉडल: 200 उत्पाद, 10 देशों में निर्यात, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश सरकार ने गो संरक्षण को महज धार्मिक आस्था तक सीमित न रखते हुए इसे ग्रामीण रोज़गार, उद्यमिता और निर्यात से जोड़ने की नीति अपनाई है, जिसने राज्य को इस क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बना दिया है। लखनऊ से संचालित इस मॉडल के तहत देसी गाय आधारित लगभग 200 प्रकार के पंचगव्य और आयुर्वेदिक उत्पाद अब अमेरिका, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूएई समेत कई देशों के बाज़ारों तक पहुँच चुके हैं। यह मॉडल अब 15 से अधिक राज्यों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है।
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में यूपी के गो-उत्पादों की पहुँच
प्रदेश में देसी गायों से तैयार पंचगव्य घृत, ब्राह्मी घृत, गोमूत्र अर्क, घनवटी, च्यवनप्राश, गो घृत, शतधौता घृत और आयुर्वेदिक काजल जैसे उत्पादों की माँग वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही है। अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, यूएई, सऊदी अरब और थाईलैंड तक इन उत्पादों की पहुँच बन चुकी है। आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय जीवनशैली के प्रति बढ़ते वैश्विक आकर्षण ने इन उत्पादों के लिए नए बाज़ार तैयार किए हैं।
उद्यमिता की नई कहानी: असीम रावत और 'हेता'
सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में करियर शुरू करने वाले असीम रावत ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से गो संरक्षण और गो-आधारित उत्पादों के क्षेत्र में कदम रखा। उनकी पहल 'हेता' आज देश और विदेश के बाज़ारों तक पहुँच चुकी है। रावत का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके से विकसित और विपणन किए गए गो-आधारित उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मज़बूती दे सकते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब देसी गाय को कभी आर्थिक दृष्टि से बोझ माना जाता था। आज वही गाय उत्तर प्रदेश में करोड़ों रुपये की गो-आधारित अर्थव्यवस्था की धुरी बन रही है — यह बदलाव नीतिगत हस्तक्षेप और बाज़ार की माँग, दोनों का परिणाम है।
सरकारी नीति और सब्सिडी
पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकेश मेश्राम के अनुसार राज्य सरकार उन्नत देसी नस्लों के पालन को बढ़ावा देने के लिए 50 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध करा रही है। साहीवाल, गिर, गंगातीरी और थारपारकर जैसी प्रमुख भारतीय नस्लों के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है। गोबर, गोमूत्र, घी और पंचगव्य आधारित उत्पादों को व्यवस्थित उद्योग का स्वरूप देकर स्वयं सहायता समूहों, गोशालाओं और छोटे उद्यमियों को भी इस आर्थिक श्रृंखला से जोड़ा जा रहा है।
अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा
गौरतलब है कि गुजरात, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब, तेलंगाना, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गोवा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश सहित 15 से अधिक राज्यों के प्रतिनिधिमंडल यूपी में गो संरक्षण, नस्ल सुधार और गो-आधारित व्यावसायिक मॉडल का प्रशिक्षण लेने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह मॉडल तब और प्रासंगिक हो जाता है जब ग्रामीण आय के पारंपरिक स्रोत दबाव में हों।
आगे की राह
सरकार की विभिन्न योजनाओं ने डेयरी और गो-आधारित उद्योग को नई गति दी है, जिससे किसानों और पशुपालकों की आय में वृद्धि हो रही है। यदि यह मॉडल अपनी वर्तमान गति बनाए रखता है, तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश गो-आधारित उत्पादों के निर्यात में राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका में आ सकता है।