डांग जिला बना देश का ट्विन-पिट शौचालय मॉडल, 95% परिवारों ने अपनाई तकनीक
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के डांग जिले ने ग्रामीण स्वच्छता के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय मिसाल कायम की है — स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत ट्विन-पिट शौचालय तकनीक को अपनाने में यह आदिवासी बहुल जिला अब पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बन चुका है। जिले के कुल 58,966 परिवारों में से 51,613 परिवार यानी लगभग 95 प्रतिशत परिवार इस तकनीक को अपना चुके हैं, जो फीकल स्लज मैनेजमेंट के क्षेत्र में एक असाधारण उपलब्धि है।
डांग जिले की उपलब्धि: आँकड़े बोलते हैं
जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए)-डांग के समन्वयक विपुल परदेशी के अनुसार, डांग जिले में तीन तहसीलें और 310 गाँव हैं और जिले की अनुमानित जनसंख्या 2.96 लाख है। घने जंगलों और हरे-भरे पहाड़ों के लिए विख्यात यह जिला अब ग्रामीण स्वच्छता की अग्रणी पंक्ति में खड़ा है। परदेशी ने बताया कि यह उपलब्धि जन भागीदारी के बिना संभव नहीं होती। सरकार ट्विन-पिट शौचालय निर्माण के लिए प्रत्येक परिवार को ₹12,000 की आर्थिक सहायता प्रदान करती है।
राष्ट्रीय मंच पर डांग की पहचान
जनवरी 2026 में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत लागू विभिन्न फीकल स्लज मैनेजमेंट मॉडलों की समीक्षा के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ एक वर्चुअल संवाद आयोजित किया। इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने की। बैठक में सुदूरवर्ती आदिवासी क्षेत्रों में ट्विन-पिट शौचालयों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए गुजरात के डांग जिले को विशेष उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।
पाटिल ने भाग लेने वाले राज्यों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे स्वच्छता मॉडल केवल स्वच्छ भारत के विज़न को साकार करने में ही सहायक नहीं बनते, बल्कि टिकाऊ कूड़ा प्रबंधन के माध्यम से रोज़गार के अवसर भी सृजित करते हैं।
ट्विन-पिट तकनीक: कैसे काम करती है यह प्रणाली
ट्विन-पिट शौचालय दिखने में सामान्य शौचालय जैसा ही होता है, लेकिन इसकी कार्यप्रणाली इसे पारंपरिक फ्लश शौचालयों से अलग बनाती है। इस प्रणाली में सामान्यतः लगभग तीन फीट गहराई वाले दो गोलाकार गड्ढे आस-पास बनाए जाते हैं। गड्ढों की दीवारें हनीकॉम्ब (मधुमक्खी के छत्ते) के आकार की बनाई जाती हैं, जिससे तरल पदार्थ आसपास की मिट्टी में शोषित हो सके।
मानव मल पहले गड्ढे में जाता है, जहाँ उसका प्राकृतिक रूप से विघटन होता है। पहला गड्ढा भर जाने पर मल-प्रवाह दूसरे गड्ढे में मोड़ दिया जाता है, और तब तक पहले गड्ढे का मल पूरी तरह विघटित होकर पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में बदल जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस तकनीक को प्रभावी और टिकाऊ स्वच्छता समाधान के रूप में मान्यता दी है।
पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर
यह तकनीक महंगी सीवर व्यवस्था और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की आवश्यकता को समाप्त करती है। भूमिगत जल प्रदूषण और असुरक्षित कूड़ा निस्तारण के जोखिम को कम कर यह सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों की रक्षा करती है। पारंपरिक फ्लश शौचालयों की तुलना में इसमें कम पानी की ज़रूरत पड़ती है, जिससे यह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से अनुकूल है। निर्माण में सीमेंट मोर्टार ईंटों के अलावा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पत्थर, लकड़ी के खंभे, कंक्रीट रिंग या पुनः उपयोग किए गए ड्रम भी काम आ सकते हैं।
स्वच्छ भारत मिशन और राज्य सरकार की भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में खुले में शौचमुक्ति का लक्ष्य प्राप्त करने और ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस व तरल कूड़ा प्रबंधन सुधारने के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की शुरुआत की थी। यह अभियान स्वच्छता, महिलाओं की सुरक्षा और सर्वांगीण ग्रामीण स्वास्थ्य पर केंद्रित एक व्यापक व्यवहार परिवर्तन आंदोलन में विकसित हुआ है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार को शौचालय उपलब्ध कराने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। डांग जिले का यह अनुभव दर्शाता है कि सही तकनीक, सरकारी सहयोग और जन भागीदारी के संयोजन से दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में भी स्थायी स्वच्छता हासिल की जा सकती है।