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हरसिमरत कौर बादल ने फडणवीस को पत्र लिखा, तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड की स्वायत्तता बचाने की माँग

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हरसिमरत कौर बादल ने फडणवीस को पत्र लिखा, तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड की स्वायत्तता बचाने की माँग

सारांश

हरसिमरत कौर बादल ने CM फडणवीस को पत्र लिखकर तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने वाले मसौदा कानून को वापस लेने की माँग की है। यह विवाद फरवरी 2024 के उस संशोधन की याद दिलाता है, जिसे सिख संगठनों के विरोध के बाद वापस लिया गया था।

मुख्य बातें

हरसिमरत कौर बादल ने 27 जून 2025 को महाराष्ट्र CM देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड की स्वायत्तता बचाने की अपील की।
प्रस्तावित मसौदा कानून 1956 के अधिनियम की जगह लेकर बोर्ड पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना चाहता है।
फरवरी 2024 में महाराष्ट्र सरकार ने बोर्ड के 17 में से 12 सदस्यों को सरकार द्वारा नामांकित करने का संशोधन किया था, जिसे विरोध के बाद वापस लिया गया था।
तख्त प्रबंधन ने पुराने अधिनियम को निरस्त करने के विरोध में 'गुरुमाता' (सामूहिक आदेश) जारी किया है।
सांसद ने माँग की कि नया मसौदा वापस लेकर 1956 का अधिनियम बहाल रखा जाए।

शिरोमणी अकाली दल (SAD) की वरिष्ठ नेता एवं बठिंडा सांसद हरसिमरत कौर बादल ने 27 जून 2025 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड की धार्मिक स्वायत्तता को बनाए रखने की अपील की। उन्होंने माँग की कि राज्य सरकार उस प्रस्तावित मसौदा कानून को वापस ले, जो बोर्ड में सरकार द्वारा नामित सदस्यों की संख्या में भारी वृद्धि करता है और सिख समुदाय की भावनाओं के विपरीत है।

विवाद की जड़: क्या है नया मसौदा कानून

हरसिमरत कौर बादल ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि प्रस्तावित नया अधिनियम सात दशक पुराने नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब अधिनियम, 1956 की जगह लेना चाहता है। यह पुराना कानून सिख समुदाय को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़े इस पवित्र धार्मिक स्थान के प्रबंधन में पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करता है। उनके अनुसार, नया प्रस्तावित ढाँचा इस स्वायत्तता को समाप्त कर बोर्ड पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास है।

फरवरी 2024 का संशोधन और उसकी वापसी

यह पहली बार नहीं है जब इस मुद्दे पर विवाद उठा है। फरवरी 2024 में महाराष्ट्र सरकार ने तख्त बोर्ड को नियंत्रित करने वाले अधिनियम में संशोधन करते हुए बोर्ड के 17 में से 12 सदस्यों को सरकार द्वारा सीधे नामांकित करने का प्रावधान किया था। उस संशोधन में शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) का प्रतिनिधित्व घटा दिया गया था और मुख्य खालसा दीवान तथा हजूर सचखंड दीवान का प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था। SGPC और स्थानीय सिख संगठनों के व्यापक विरोध के बाद उस संशोधन को वापस लिया गया था। अब आशंका है कि नए मसौदा कानून में उसी तर्ज पर बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है।

सिख संगठनों की आपत्ति और 'गुरुमाता'

हरसिमरत कौर बादल ने पत्र में बताया कि तख्त प्रबंधन ने पुराने अधिनियम को निरस्त करने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले के विरोध में एक 'गुरुमाता' (सामूहिक आदेश) भी जारी किया है। उनका कहना है कि सिख संगठनों से कोई सलाह-मशवरा किए बिना बोर्ड के ढाँचे में बदलाव लाने की कोशिश यह धारणा पैदा करती है कि राज्य सरकार बोर्ड की स्वायत्तता को नष्ट करना चाहती है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के सिख इसे पवित्र स्थान पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

सांसद की माँग: पुराना अधिनियम बहाल रखा जाए

बठिंडा सांसद ने मुख्यमंत्री फडणवीस से आग्रह किया कि नए मसौदा कानून को वापस लेकर 1956 के अधिनियम को लागू रहने दिया जाए। उन्होंने जोर दिया कि तख्त श्री हजूर साहिब की 'मर्यादा' (आचार संहिता), प्रबंधन और धार्मिक स्वायत्तता को प्रभावित करने वाला कोई भी निर्णय एकतरफा नहीं लिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, यह कदम सिख समुदाय में बढ़ते तनाव को कम करने में सहायक होगा। मुख्यमंत्री से इस मुद्दे का शीघ्र समाधान करने का अनुरोध करते हुए उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार को सिख धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी नए मसौदे में उसी दिशा में कदम बढ़ाना सवाल खड़े करता है। SGPC और हजूर सचखंड दीवान जैसे प्रतिनिधि निकायों को दरकिनार कर बनाई गई कोई भी नीति दीर्घकालिक विश्वास की कमी को और गहरा करेगी। मुख्यधारा की कवरेज इस विवाद को केवल राजनीतिक माँग के रूप में देख रही है, जबकि असली मुद्दा धार्मिक स्वशासन के संवैधानिक अधिकार का है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तख्त श्री हजूर साहिब बोर्ड विवाद क्या है?
महाराष्ट्र सरकार एक नया मसौदा कानून लाना चाहती है जो 1956 के नांदेड़ सिख गुरुद्वारा अधिनियम की जगह लेगा और बोर्ड में सरकार द्वारा नामित सदस्यों की संख्या बढ़ाएगा। सिख संगठनों का कहना है कि यह बोर्ड की धार्मिक स्वायत्तता को समाप्त करने की कोशिश है।
हरसिमरत कौर बादल ने CM फडणवीस से क्या माँग की है?
उन्होंने माँग की है कि प्रस्तावित मसौदा कानून वापस लिया जाए और 1956 का मूल अधिनियम बहाल रखा जाए, जो सिख समुदाय को तख्त के प्रबंधन में पूर्ण स्वायत्तता देता है। उनका कहना है कि कोई भी बदलाव SGPC और सिख संगठनों से परामर्श के बिना नहीं होना चाहिए।
फरवरी 2024 का संशोधन क्यों वापस लिया गया था?
फरवरी 2024 में महाराष्ट्र सरकार ने बोर्ड के 17 में से 12 सदस्यों को सरकार द्वारा नामांकित करने का संशोधन किया था। SGPC और स्थानीय सिख संगठनों के व्यापक विरोध के बाद इसे वापस लेना पड़ा था।
'गुरुमाता' क्या है और इसका क्या महत्व है?
'गुरुमाता' सिख परंपरा में एक सामूहिक आदेश होता है, जो समुदाय की साझा इच्छाशक्ति को व्यक्त करता है। तख्त प्रबंधन ने पुराने अधिनियम को निरस्त करने के विरोध में यह 'गुरुमाता' जारी किया है, जो इस मुद्दे की धार्मिक गंभीरता को रेखांकित करता है।
इस विवाद से कौन प्रभावित होता है?
यह विवाद नांदेड़ (महाराष्ट्र) स्थित तख्त श्री हजूर साहिब से जुड़े सिख श्रद्धालुओं और प्रबंधन को प्रभावित करता है। SGPC, मुख्य खालसा दीवान और हजूर सचखंड दीवान जैसे प्रमुख सिख संगठनों का प्रतिनिधित्व दाँव पर है, और दुनिया भर के सिख इस घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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