केरल: विपक्ष उप-नेता पद पर सीपीआई-सीपीएम में खुला टकराव, एलडीएफ संयोजक रामकृष्णन ने माँगा संयम
सारांश
मुख्य बातें
केरल में विधानसभा में विपक्ष के उप-नेता के पद को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीआई-एम) के बीच सार्वजनिक कलह तेज़ हो गई है। स्थिति इतनी बिगड़ी कि वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के संयोजक टी.पी. रामकृष्णन को शुक्रवार, 29 अगस्त 2025 को बीच-बचाव करना पड़ा और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील करनी पड़ी।
विवाद की जड़
यह विवाद वामपंथी दलों की चुनावी हार के बाद सीपीआई की उस माँग से शुरू हुआ जिसमें उसने विधानसभा में विपक्ष के उप-नेता का पद अपने लिए माँगा। सीपीआई के राज्य सचिव बिनॉय विश्वम ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी पार्टी यह पद किसी भी स्थिति में नहीं छोड़ेगी। इस बयान को पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने खारिज कर दिया, जिससे जो मामला बंद दरवाज़ों के पीछे सुलझाया जा सकता था, वह खुले मंच पर आ गया।
रामकृष्णन ने स्पष्ट किया कि विजयन की पिछली टिप्पणियाँ गठबंधन द्वारा पहले लिए गए फैसले पर आधारित थीं, और यह भी कहा कि सीपीआई-एम का आधिकारिक रुख केवल पार्टी के राज्य सचिव द्वारा ही व्यक्त किया जाना चाहिए।
रामकृष्णन का दखल
रामकृष्णन ने कहा, 'समस्याओं को बातचीत के जरिए सुलझाना होगा। समाधान खोजने की कोशिशें जारी हैं।' राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह हस्तक्षेप महज़ शांति की अपील नहीं, बल्कि कोझिकोड में अगले महीने होने वाली सीपीआई-एम की राज्य समिति की विस्तारित बैठक से पहले विवाद को दबाने की रणनीतिक कोशिश है।
गौरतलब है कि इस तरह का सार्वजनिक मतभेद एलडीएफ के लिए राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील समय में आया है।
सोशल मीडिया पर ऐतिहासिक हमले
यह कड़वाहट अब सोशल मीडिया तक फैल चुकी है, जहाँ 1970 के दशक के उन उदाहरणों का हवाला दिया जा रहा है जब सीपीआई नेता कांग्रेस के समर्थन से केरल के मुख्यमंत्री बने थे। इन पुराने संदर्भों को वर्तमान टकराव में उछालकर दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच की दरार को ऐतिहासिक आयाम दिया जा रहा है।
सीपीआई-एम पर दोहरा दबाव
सीपीआई-एम पहले से ही अपनी सबसे बुरी चुनावी हार के नतीजों से उबरने की कोशिश में है। पूर्व मुख्यमंत्री विजयन की राजनीतिक साख को भी इस हार से धक्का लगा है। इसके अलावा, उनकी बेटी वीना विजयन की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जाँच ने उन पर व्यक्तिगत और राजनीतिक दबाव और बढ़ा दिया है।
इस पृष्ठभूमि में, सीपीआई के साथ यह सार्वजनिक विवाद पार्टी के लिए एक और मोर्चे पर मुश्किल खड़ी कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि यदि यह टकराव लंबा खिंचा, तो वामपंथ की आंतरिक एकता का भ्रम टूट सकता है।
आगे क्या होगा
फिलहाल दोनों दलों के बीच बातचीत जारी बताई जा रही है। कोझिकोड में होने वाली सीपीआई-एम की राज्य समिति की विस्तारित बैठक इस विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। यदि तब तक समझौता नहीं हुआ, तो यह मुद्दा बैठक में और विस्फोटक रूप ले सकता है।