16 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

भारत-जापान की 'महासागर' और 'एफओआईपी' साझेदारी: हिंद-प्रशांत में लोकतांत्रिक धुरी मजबूत

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
भारत-जापान की 'महासागर' और 'एफओआईपी' साझेदारी: हिंद-प्रशांत में लोकतांत्रिक धुरी मजबूत

सारांश

भारत की 'महासागर' और जापान की 'एफओआईपी' — दो अलग-अलग नाम, एक साझा दृष्टि। सागर से महासागर तक का भारत का सफर और ताकाइची का भारत को 'अनिवार्य साझेदार' कहना बताता है कि हिंद-प्रशांत में एक लोकतांत्रिक धुरी आकार ले रही है, जो चीन की बीआरआई रणनीति के सामने एक वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी कर रही है।

मुख्य बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2015 में 'सागर' और मार्च 2025 में मॉरीशस से 'महासागर' पहल की शुरुआत की।
जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने अपने हालिया लेख में 'एफओआईपी' को भारत की 'महासागर' सोच के साथ जोड़ा और भारत को 'अत्यावश्यक साझेदार' बताया।
दोनों पहलें मिलकर चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) और 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के सामने एक लोकतांत्रिक विकल्प प्रस्तुत करती हैं।
क्वाड और एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी) के तहत भारत-जापान बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका व अफ्रीकी देशों में साझा परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।
'महासागर' और 'एफओआईपी' ग्लोबल साउथ के देशों को बाहरी दबाव से मुक्त होकर स्वायत्त निर्णय लेने का विकल्प देती हैं।

भारत और जापान की समुद्री रणनीतियाँ — भारत की 'महासागर' पहल और जापान की 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' (एफओआईपी) नीति — 1 जुलाई 2026 को एक नई रणनीतिक निकटता के रूप में सामने आई हैं, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और विकास को एक साथ साधने का लक्ष्य रखती हैं। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने हाल ही में एक लेख में स्पष्ट रूप से कहा कि उनकी एफओआईपी सोच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'महासागर' पहल के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। यह दोनों पहलें मिलकर ग्लोबल साउथ के देशों को बाहरी दबाव से मुक्त होकर अपने फैसले खुद लेने का एक ठोस विकल्प देती हैं।

सागर से महासागर: भारत की विस्तरित समुद्री सोच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार मार्च 2015 में मॉरीशस में 'सागर' — यानी 'क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास' — की अवधारणा सामने रखी थी। यह अवसर था जब उन्होंने कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स द्वारा निर्मित ऑफशोर पेट्रोल पोत बराकुडा को मॉरीशस की नौसेना में शामिल कराया था। 'सागर' का मूल उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करना था, जिसमें भारत एक 'भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार' की भूमिका में था।

ठीक दस वर्ष बाद, मार्च 2025 में जब मोदी पुनः मॉरीशस गए, तो उन्होंने 'महासागर' — यानी 'क्षेत्रों के पार सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र प्रगति' — की शुरुआत की। यह पहले के दृष्टिकोण का विस्तार है। भारतीय भाषाओं में 'सागर' का अर्थ समुद्र है, जबकि 'महासागर' का अर्थ महासमुद्र — यह नामकरण स्वयं भारत की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।

गौरतलब है कि 'महासागर' अब केवल हिंद महासागर क्षेत्र तक सीमित नहीं है। थाईलैंड में भारत की पूर्व राजदूत सुचित्रा दुरई के अनुसार, मोदी की मॉरीशस, मालदीव, त्रिनिदाद और टोबैगो, घाना और फिलीपींस जैसे देशों के साथ यात्राएँ और बातचीत इसी 'महासागर' सोच की अभिव्यक्ति हैं।

जापान की एफओआईपी: ताकाइची का नज़रिया

जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने अपने हालिया लेख में कहा कि एक वास्तविक मुक्त और खुला क्षेत्र वह नहीं है जहाँ केवल बड़ी शक्तियों को स्वतंत्रता हो, बल्कि ऐसा क्षेत्र होना चाहिए जहाँ हर देश बिना किसी बाहरी दबाव के अपनी राह स्वयं चुन सके। उन्होंने भारत को एक 'अत्यावश्यक साझेदार' बताते हुए कहा कि भारत एक समुद्री राष्ट्र है जिसने क्षेत्रीय स्थिरता और पड़ोसी देशों को सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं।

जापान की एफओआईपी नीति जहाँ कानून के शासन और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता पर केंद्रित है, वहीं भारत की 'महासागर' सोच इसमें विकास, व्यापार और पर्यावरणीय स्थिरता का आयाम जोड़ती है। इस प्रकार दोनों पहलें एक-दूसरे की पूरक हैं।

चीन की रणनीति के मुकाबले लोकतांत्रिक विकल्प

यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य गतिविधियाँ और दक्षिण एशिया में उसकी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति तथा बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के ज़रिए बढ़ता प्रभाव छोटे देशों में गहरी चिंता पैदा कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि बीआरआई कई देशों को ऋण-जाल में फँसाता है और उनकी संप्रभुता को कमज़ोर करता है।

'महासागर' और 'एफओआईपी' मिलकर इस चुनौती के सामने एक लोकतांत्रिक विकल्प खड़ा करते हैं — जिसमें साझेदारी स्वैच्छिक हो, निर्भरता नहीं। अमेरिका जैसी बड़ी शक्ति भी अपनी भूमिका और नीतियों को नए हालात के अनुसार पुनर्परिभाषित कर रही है, ऐसे में भारत और जापान जैसी मध्यम शक्तियों के लिए नेतृत्व का अवसर स्वाभाविक रूप से उभरा है।

द्विपक्षीय ढाँचा: क्वाड और एएजीसी

भारत-जापान संबंधों की जड़ें सांस्कृतिक और सभ्यतागत स्तर पर गहरी हैं, लेकिन हाल के वर्षों में यह रिश्ता एक उद्देश्यपूर्ण रणनीतिक साझेदारी में बदल गया है। क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) — जिसमें भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं — इस सहयोग का सबसे प्रमुख रक्षा मंच है।

इसके अलावा, एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी) के तहत भारत और जापान पहले से ही बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और कई अफ्रीकी देशों में संयुक्त परियोजनाओं पर कार्य कर रहे हैं। यह सहयोग 'महासागर' और 'एफओआईपी' की साझा भावना का व्यावहारिक प्रतिबिंब है।

ग्लोबल साउथ के लिए क्या अर्थ है

ग्लोबल साउथ के देशों के लिए 'महासागर' और 'एफओआईपी' की यह जुगलबंदी केवल एक कूटनीतिक घोषणा नहीं है — यह एकतरफा निर्भरता के बजाय बहुपक्षीय साझेदारी का एक व्यावहारिक रास्ता है। सुरक्षा, विकास, व्यापार और पर्यावरण को एक साथ साधने की यह कोशिश उन देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो बड़ी शक्तियों के बीच अपनी स्वायत्तता बनाए रखना चाहते हैं। आने वाले समय में दोनों देशों की इन पहलों के क्रियान्वयन और उनकी वास्तविक पहुँच पर दुनिया की निगाहें टिकी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की होगी — घोषणाओं की नहीं। एएजीसी 2017 में घोषित हुआ था, पर ज़मीन पर उसकी रफ्तार बीआरआई की तुलना में धीमी रही है। 'महासागर' में विकास का आयाम जोड़ना सही दिशा है, किंतु ग्लोबल साउथ के देश तब तक आश्वस्त नहीं होंगे जब तक वित्तपोषण, समयसीमा और पारदर्शिता के ठोस ढाँचे सामने न आएँ। यह भी ध्यान देने योग्य है कि क्वाड अभी भी एक औपचारिक सुरक्षा संधि नहीं है — इसलिए 'लोकतांत्रिक धुरी' की ताकत उसकी संस्थागत गहराई पर निर्भर करेगी।
RashtraPress
16 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत की 'महासागर' पहल क्या है और यह 'सागर' से कैसे अलग है?
'महासागर' — 'क्षेत्रों के पार सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र प्रगति' — मार्च 2025 में मॉरीशस से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गई पहल है। यह 2015 की 'सागर' अवधारणा का विस्तार है — जहाँ 'सागर' हिंद महासागर क्षेत्र तक केंद्रित था, वहीं 'महासागर' ग्लोबल साउथ के व्यापक समुद्री और विकास हितों को समेटता है।
जापान की 'एफओआईपी' नीति क्या है?
'एफओआईपी' यानी 'मुक्त और खुला हिंद-प्रशांत' जापान की वह विदेश नीति है जो कानून के शासन, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय देशों की संप्रभुता पर जोर देती है। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने इसे भारत की 'महासागर' सोच के साथ जोड़ते हुए कहा है कि दोनों मिलकर एक लोकतांत्रिक क्षेत्रीय व्यवस्था का आधार बनाते हैं।
यह साझेदारी चीन की बीआरआई रणनीति के मुकाबले कैसे खड़ी होती है?
भारत की 'महासागर' और जापान की 'एफओआईपी' मिलकर चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के सामने एक स्वैच्छिक, विकास-केंद्रित और लोकतांत्रिक विकल्प प्रस्तुत करती हैं। आलोचकों का कहना है कि बीआरआई कई छोटे देशों को ऋण-निर्भरता में फँसाता है, जबकि 'महासागर'-'एफओआईपी' ढाँचा देशों को स्वायत्त निर्णय का अधिकार देता है।
क्वाड और एएजीसी इस साझेदारी में क्या भूमिका निभाते हैं?
क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) — भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का मंच — रक्षा और समुद्री सुरक्षा सहयोग का प्रमुख ढाँचा है। एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी) के तहत भारत और जापान बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और अफ्रीकी देशों में संयुक्त विकास परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।
ग्लोबल साउथ के देशों को इस साझेदारी से क्या लाभ मिल सकता है?
ग्लोबल साउथ के देशों के लिए 'महासागर' और 'एफओआईपी' एकतरफा निर्भरता के बजाय बहुपक्षीय साझेदारी का विकल्प देती हैं। इसमें सुरक्षा, व्यापार, विकास और पर्यावरणीय स्थिरता एक साथ शामिल हैं, जिससे छोटे देश बड़ी शक्तियों के दबाव से मुक्त होकर अपनी नीतियाँ स्वयं तय कर सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 1 महीना पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 8 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले