भारत-जापान की 'महासागर' और 'एफओआईपी' साझेदारी: हिंद-प्रशांत में लोकतांत्रिक धुरी मजबूत
सारांश
मुख्य बातें
भारत और जापान की समुद्री रणनीतियाँ — भारत की 'महासागर' पहल और जापान की 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' (एफओआईपी) नीति — 1 जुलाई 2026 को एक नई रणनीतिक निकटता के रूप में सामने आई हैं, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और विकास को एक साथ साधने का लक्ष्य रखती हैं। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने हाल ही में एक लेख में स्पष्ट रूप से कहा कि उनकी एफओआईपी सोच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'महासागर' पहल के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। यह दोनों पहलें मिलकर ग्लोबल साउथ के देशों को बाहरी दबाव से मुक्त होकर अपने फैसले खुद लेने का एक ठोस विकल्प देती हैं।
सागर से महासागर: भारत की विस्तरित समुद्री सोच
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार मार्च 2015 में मॉरीशस में 'सागर' — यानी 'क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास' — की अवधारणा सामने रखी थी। यह अवसर था जब उन्होंने कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स द्वारा निर्मित ऑफशोर पेट्रोल पोत बराकुडा को मॉरीशस की नौसेना में शामिल कराया था। 'सागर' का मूल उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करना था, जिसमें भारत एक 'भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार' की भूमिका में था।
ठीक दस वर्ष बाद, मार्च 2025 में जब मोदी पुनः मॉरीशस गए, तो उन्होंने 'महासागर' — यानी 'क्षेत्रों के पार सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र प्रगति' — की शुरुआत की। यह पहले के दृष्टिकोण का विस्तार है। भारतीय भाषाओं में 'सागर' का अर्थ समुद्र है, जबकि 'महासागर' का अर्थ महासमुद्र — यह नामकरण स्वयं भारत की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।
गौरतलब है कि 'महासागर' अब केवल हिंद महासागर क्षेत्र तक सीमित नहीं है। थाईलैंड में भारत की पूर्व राजदूत सुचित्रा दुरई के अनुसार, मोदी की मॉरीशस, मालदीव, त्रिनिदाद और टोबैगो, घाना और फिलीपींस जैसे देशों के साथ यात्राएँ और बातचीत इसी 'महासागर' सोच की अभिव्यक्ति हैं।
जापान की एफओआईपी: ताकाइची का नज़रिया
जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने अपने हालिया लेख में कहा कि एक वास्तविक मुक्त और खुला क्षेत्र वह नहीं है जहाँ केवल बड़ी शक्तियों को स्वतंत्रता हो, बल्कि ऐसा क्षेत्र होना चाहिए जहाँ हर देश बिना किसी बाहरी दबाव के अपनी राह स्वयं चुन सके। उन्होंने भारत को एक 'अत्यावश्यक साझेदार' बताते हुए कहा कि भारत एक समुद्री राष्ट्र है जिसने क्षेत्रीय स्थिरता और पड़ोसी देशों को सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं।
जापान की एफओआईपी नीति जहाँ कानून के शासन और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता पर केंद्रित है, वहीं भारत की 'महासागर' सोच इसमें विकास, व्यापार और पर्यावरणीय स्थिरता का आयाम जोड़ती है। इस प्रकार दोनों पहलें एक-दूसरे की पूरक हैं।
चीन की रणनीति के मुकाबले लोकतांत्रिक विकल्प
यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य गतिविधियाँ और दक्षिण एशिया में उसकी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति तथा बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के ज़रिए बढ़ता प्रभाव छोटे देशों में गहरी चिंता पैदा कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि बीआरआई कई देशों को ऋण-जाल में फँसाता है और उनकी संप्रभुता को कमज़ोर करता है।
'महासागर' और 'एफओआईपी' मिलकर इस चुनौती के सामने एक लोकतांत्रिक विकल्प खड़ा करते हैं — जिसमें साझेदारी स्वैच्छिक हो, निर्भरता नहीं। अमेरिका जैसी बड़ी शक्ति भी अपनी भूमिका और नीतियों को नए हालात के अनुसार पुनर्परिभाषित कर रही है, ऐसे में भारत और जापान जैसी मध्यम शक्तियों के लिए नेतृत्व का अवसर स्वाभाविक रूप से उभरा है।
द्विपक्षीय ढाँचा: क्वाड और एएजीसी
भारत-जापान संबंधों की जड़ें सांस्कृतिक और सभ्यतागत स्तर पर गहरी हैं, लेकिन हाल के वर्षों में यह रिश्ता एक उद्देश्यपूर्ण रणनीतिक साझेदारी में बदल गया है। क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) — जिसमें भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं — इस सहयोग का सबसे प्रमुख रक्षा मंच है।
इसके अलावा, एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी) के तहत भारत और जापान पहले से ही बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और कई अफ्रीकी देशों में संयुक्त परियोजनाओं पर कार्य कर रहे हैं। यह सहयोग 'महासागर' और 'एफओआईपी' की साझा भावना का व्यावहारिक प्रतिबिंब है।
ग्लोबल साउथ के लिए क्या अर्थ है
ग्लोबल साउथ के देशों के लिए 'महासागर' और 'एफओआईपी' की यह जुगलबंदी केवल एक कूटनीतिक घोषणा नहीं है — यह एकतरफा निर्भरता के बजाय बहुपक्षीय साझेदारी का एक व्यावहारिक रास्ता है। सुरक्षा, विकास, व्यापार और पर्यावरण को एक साथ साधने की यह कोशिश उन देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो बड़ी शक्तियों के बीच अपनी स्वायत्तता बनाए रखना चाहते हैं। आने वाले समय में दोनों देशों की इन पहलों के क्रियान्वयन और उनकी वास्तविक पहुँच पर दुनिया की निगाहें टिकी रहेंगी।