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क्या इंदिरा एकादशी का पारण और द्वादशी श्राद्ध एक साथ हो रहे हैं? जानें शुभ मुहूर्त और विधि

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क्या इंदिरा एकादशी का पारण और द्वादशी श्राद्ध एक साथ हो रहे हैं? जानें शुभ मुहूर्त और विधि

सारांश

इस लेख में हम जानेंगे कि इंदिरा एकादशी का पारण और द्वादशी श्राद्ध एक साथ क्यों मनाया जा रहा है। साथ ही शुभ मुहूर्त और विधि के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे।

मुख्य बातें

इंदिरा एकादशी का पारण और द्वादशी श्राद्ध एक साथ मनाया जाएगा।
द्वादशी तिथि का महत्व है और इसे विशेष रूप से पूर्वजों के लिए किया जाता है।
घर की सफाई और गंगाजल से शुद्धिकरण आवश्यक है।
सफेद फूलों और विशेष सामग्री का उपयोग श्राद्ध में किया जाता है।
पारण का समय ध्यान रखना चाहिए।

नई दिल्ली, 17 सितंबर (राष्ट्र प्रेस)। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि गुरुवार को है। इस दिन द्वादशी श्राद्ध के साथ इंदिरा एकादशी का पारण भी किया जाएगा। वहीं, सूर्य कन्या राशि में और चंद्रमा कर्क राशि में रहेंगे।

दृक पंचांग के अनुसार, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर 39 मिनट तक रहेगा, और राहुकाल का समय दोपहर के 12 बजकर 15 मिनट से शुरू होकर 1 बजकर 47 मिनट तक रहेगा।

इस दिन द्वादशी तिथि 17 सितंबर रात के 11 बजकर 39 मिनट से शुरू होकर 18 सितंबर सुबह 11 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। इसके बाद त्रयोदशी तिथि लग जाएगी। इस हिसाब से द्वादशी श्राद्ध गुरुवार को ही है।

पुराणों के अनुसार, द्वादशी श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु द्वादशी तिथि पर हुई हो या जिन्होंने अपने जीवनकाल में संन्यास लिया हो। इसे मुख्य रूप से 'संन्यासी श्राद्ध' भी कहते हैं, क्योंकि यह संन्यासियों के श्राद्ध का दिन है। इस श्राद्ध को करने से धन-धान्य, आरोग्य, विजय और दीर्घायु प्राप्त होती है।

पितृ पक्ष में पार्वण श्राद्ध के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त शुभ माने जाते हैं। श्राद्ध के अनुष्ठान अपराह्न काल तक पूरे कर लेने चाहिए और अंत में तर्पण किया जाता है, जिससे पितरों को शांति और तृप्ति मिलती है।

श्राद्ध करने के लिए घर की सफाई करें और गंगाजल और गौमूत्र से घर को शुद्ध करें। साथ ही दक्षिण दिशा में मुंह रखकर तर्पण करें। घर के आंगन में रंगोली बनाएं, पितरों के लिए शुद्ध भोजन बनाएं। सबसे पहले अपने मान या फिर ब्राह्मणों को निमंत्रण दें और उन्हें भोजन कराएं। उसके बाद दक्षिना और सामग्री दान करें, जिसमें गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि शामिल हैं। श्राद्ध में सफेद फूलों का उपयोग करें। दूध, गंगाजल, शहद, सफेद कपड़े और तिल का विशेष महत्व है।

एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि खत्म होने तक ही कर लेना चाहिए, अगर आप तिथि के बाद व्रत तोड़ते हैं, तो उसका कोई महत्व नहीं रहता है।

पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। व्रत तोड़ने के लिए प्रातःकाल सबसे उपयुक्त समय है, लेकिन अगर यह संभव न हो तो मध्याह्न के बाद पारण किया जा सकता है। एकादशी व्रत कभी-कभी लगातार दो दिनों के लिए होता है, जिसमें स्मार्त परिवार के लोगों को पहले दिन और संन्यासी मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोगों को दूसरे दिन व्रत करना चाहिए।

संपादकीय दृष्टिकोण

इंदिरा एकादशी और द्वादशी श्राद्ध का एक साथ होना यह दर्शाता है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर में धार्मिक अनुष्ठानों का कितना महत्व है। इसे मनाने से समाज में एकजुटता और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त होती है।
RashtraPress
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंदिरा एकादशी का पारण कब करना चाहिए?
इंदिरा एकादशी का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए।
द्वादशी श्राद्ध किसके लिए किया जाता है?
द्वादशी श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु द्वादशी तिथि पर हुई हो।
श्राद्ध करने के लिए क्या आवश्यक है?
श्राद्ध करने के लिए घर की सफाई, गंगाजल से शुद्धिकरण और पितरों के लिए शुद्ध भोजन बनाना आवश्यक है।
पारण का शुभ समय क्या है?
पारण का शुभ समय सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले होता है।
श्राद्ध में किन चीजों का दान करना चाहिए?
श्राद्ध में गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि का दान करना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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