जाति आधारित नामों के हटाने के आदेश पर मदुरै बेंच का कड़ा रुख, तमिलनाडु सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा
सारांश
Key Takeaways
- जाति आधारित नामों को हटाने की प्रक्रिया पर अदालत का कड़ा रुख।
- तमिलनाडु सरकार को विस्तृत स्पष्टीकरण देने का निर्देश।
- सामाजिक संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही का संतुलन आवश्यक।
मदुरै, 20 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जाति आधारित नामों को हटाने के सरकारी आदेश पर रोक लगाने की मांग से संबंधित मामले में मदुरै बेंच ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया है कि वे राज्य भर की स्थानीय निकायों में आपत्तिजनक नामों के संबंध में विस्तृत जवाब प्रस्तुत करें।
जस्टिस सतीश कुमार और जस्टिस जोतिरमन की बेंच ने यह आदेश सुनवाई के दौरान जारी किया। अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि किन सड़कों, गलियों, गांवों और अन्य सार्वजनिक स्थलों के नाम आपत्तिजनक माने जाते हैं और किन नामों को हटाना आवश्यक है।
इस मामले की पृष्ठभूमि यह है कि परमशिवम नामक एक व्यक्ति ने याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री की घोषणा के आधार पर, सरकार ने राज्य के गांवों, बस्तियों, गलियों, सड़कों और जल स्रोतों से जाति-आधारित नाम हटाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे और एक सरकारी आदेश (जीओ) भी पारित किया था। सरकार ने इस प्रक्रिया को 19 नवंबर तक पूरा करने का समय निर्धारित किया था। इसमें आदि द्रविड़ कॉलोनी, हरिजन सेटलमेंट, और “वन्ननकुलम” जैसे नाम शामिल थे।
याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि इस प्रक्रिया को लागू करने में कई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं और उन्होंने आदेश पर रोक लगाने की मांग की। इससे पहले की सुनवाई में भी अदालत ने सरकारी आदेश के लागू होने पर अंतरिम रोक लगा दी थी।
अदालत ने इस सुनवाई में सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा और कहा कि उन्हें विस्तार से बताना होगा कि कौन से नाम आपत्तिजनक हैं और किन नामों को हटाना चाहिए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई को स्थगित कर दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला राज्य के स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखने के प्रयास का हिस्सा है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जाति-आधारित नाम हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत हो।