झारखंड हाई कोर्ट का सीबीआई पर सख्त रुख: 11 सांसद-विधायक मामलों में जांच सुस्ती पर जवाब तलब
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाई कोर्ट ने 4 नवंबर 2026 को सांसदों और विधायकों के विरुद्ध लंबित 11 आपराधिक मामलों की सुनवाई में हो रही अनावश्यक देरी पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की। अदालत ने विशेष रूप से केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से गवाहों को समय पर पेश न कर पाने और दस्तावेज़ जुटाने में बरती जा रही ढिलाई पर कड़े सवाल किए।
मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय की पीठ के समक्ष बुधवार को इस विषय पर सुनवाई हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमों का ट्रायल लंबे अरसे से लटका हुआ है। इस स्थिति को अदालत ने असंतोषजनक और अस्वीकार्य बताया।
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर की अदालतों को निर्देश दिया है कि सांसदों और विधायकों पर लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जाए और उनका शीघ्र निपटारा सुनिश्चित किया जाए। इसके बावजूद झारखंड में स्थिति जस की तस बनी हुई है।
सीबीआई की दलीलें और अदालत की आपत्ति
सीबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि कुछ पुराने मामलों में गवाह अपने दर्ज पते पर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं, जिससे उनकी गवाही दर्ज कराने में व्यावहारिक बाधाएँ आ रही हैं। एजेंसी ने इसे सुनवाई में विलंब की प्रमुख वजहों में से एक बताया।
हालाँकि अदालत ने इस स्पष्टीकरण से संतुष्टि नहीं जताई। पीठ ने कहा कि दस्तावेज़ संकलन में ही अत्यधिक समय खपाया जा रहा है, और गवाहों को अदालत में उपस्थित कराने में अपेक्षित स्फूर्ति नहीं दिखाई दे रही है। इस शिथिलता के कारण मुकदमों की प्रगति बाधित हो रही है।
अदालत का निर्देश: निचली अदालत से रिकॉर्ड तलब
मामलों की वास्तविक स्थिति और सुनवाई की प्रगति का आकलन करने के उद्देश्य से हाई कोर्ट ने दो प्रमुख मामलों का सम्पूर्ण रिकॉर्ड संबंधित निचली अदालत से मँगाया है। इन अभिलेखों के माध्यम से अदालत यह जाँचना चाहती है कि सुनवाई किस चरण में है और किन विशेष कारणों से प्रत्येक मामले में देरी हुई है।
यह कदम इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अदालत अब सीधे ट्रायल की प्रगति की निगरानी करने की स्थिति में आ गई है। विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की न्यायिक निगरानी जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाने का प्रभावी माध्यम है।
व्यापक संदर्भ और आम जनता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक मामलों को लेकर देशभर में बहस तेज़ है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आँकड़ों के अनुसार देश की विभिन्न विधानसभाओं और संसद में बड़ी संख्या में ऐसे जनप्रतिनिधि हैं जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन मामलों में ट्रायल की सुस्त रफ़्तार न केवल न्यायिक विश्वसनीयता को प्रभावित करती है, बल्कि जनसाधारण में यह संदेश भी जाता है कि राजनीतिक प्रभाव के चलते मामले लटकाए जा सकते हैं।
झारखंड में अभी 11 ऐसे आपराधिक मामले लंबित हैं जो सांसदों और विधायकों से जुड़े हैं। इनके शीघ्र निपटारे से न केवल न्याय की प्रक्रिया पुष्ट होगी, बल्कि यह संवैधानिक जवाबदेही का भी संकेत देगा।
आगे क्या होगा
हाई कोर्ट ने निचली अदालत से रिकॉर्ड मँगाने के साथ ही जाँच एजेंसियों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि आगे और शिथिलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगली सुनवाई में सीबीआई से विस्तृत स्थिति-विवरण माँगे जाने की संभावना है। विधिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि हाई कोर्ट की यह सतर्कता जारी रही, तो लंबित मामलों में ट्रायल की गति में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है।