झीरम घाटी नरसंहार: तीसरे दिन सड़क पर एक भी पुलिसकर्मी नहीं था — टीएस सिंह देव का बड़ा दावा
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने 16 सितंबर 2026 को अंबिकापुर में पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि 25 मई 2013 के झीरम घाटी नक्सली हमले वाले दिन कांग्रेस नेताओं के काफिले के मार्ग पर एक भी सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं था। उनका यह बयान उस समय आया है जब जगदलपुर स्थित राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने इस नरसंहार मामले में 10 दोषियों को फाँसी की सज़ा सुनाई है।
मुख्य घटनाक्रम
25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस के काफिले पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें 29 लोगों की मौत हुई थी। मारे गए लोगों में पार्टी के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता शामिल थे। यह छत्तीसगढ़ के इतिहास में नक्सल हिंसा की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक मानी जाती है।
सिंह देव उस समय पार्टी कार्यक्रम के प्रभारी थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने पाँच-छह दिन के दौरे के लिए DGP कार्यालय से लेकर IG स्तर तक सभी संबंधित अधिकारियों को लिखित जानकारी दी थी और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने का अनुरोध किया था।
पहले दो दिन बनाम तीसरे दिन की सुरक्षा व्यवस्था
सिंह देव के मुताबिक, पहले दिन बीजापुर और दूसरे दिन जगदलपुर के कार्यक्रमों में सुरक्षा व्यवस्था पूर्णतः संतोषजनक थी और कोई चूक नहीं हुई थी। उन्होंने कहा, 'कार्यक्रम की जानकारी प्रशासन को दी गई थी और उसके अनुसार पहले दो दिनों तक पूरी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई गई।'
तीसरे दिन स्थिति पूरी तरह बदल गई। उन्होंने दावा किया कि वे निर्धारित समय से करीब आधा घंटा पहले निकले — क्योंकि तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल का कार्यक्रम था और अध्यक्ष होने के नाते उन्हें सुकमा पहुँचना था — तब उन्होंने देखा कि 'सड़क पर एक भी पुलिसकर्मी नहीं था, न कोई सुरक्षा बल तैनात था और न ही रास्ते में कोई रोक-टोक थी।'
सुकमा तक का सफ़र और वापसी
सिंह देव ने बताया कि सुकमा तक की उनकी यात्रा पूरी तरह सामान्य और शांतिपूर्ण रही। उन्होंने कहा, 'सुकमा पहुँचने से पहले पुलिस कैंप के पास कुछ लोग दिखाई दिए, लेकिन वकावनघाटी में एक भी अधिकारी तैनात नहीं था।' सुकमा में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद, पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उन्होंने अगली सभा की तैयारियों के लिए वहाँ से निकलने की अनुमति ली — इसके बावजूद रास्ते में कहीं भी सुरक्षा बल नज़र नहीं आए।
सिंह देव के सवाल और फाँसी की सज़ा पर प्रतिक्रिया
सिंह देव ने सवाल उठाते हुए कहा, 'यह कैसे हुआ? वही व्यवस्था, जिसने पहले दो दिनों तक हमें पूरी सुरक्षा दी, तीसरे दिन अचानक क्यों नदारद हो गई?' उन्होंने माँग की कि इस पूरे मामले के कई पहलुओं की जाँच होना अभी भी आवश्यक है।
NIA की विशेष अदालत द्वारा 10 दोषियों को फाँसी की सज़ा दिए जाने पर उन्होंने कहा, 'फाँसी की सज़ा से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती। कौन-कौन से नक्सली इस हमले में शामिल थे और कौन नहीं, यह अलग विषय है — यह जाँच का मामला है।'
क्या होगा आगे
यह ऐसे समय में आया है जब झीरम घाटी नरसंहार से जुड़े कई प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं — विशेषकर सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी को लेकर। दोषियों को फाँसी की सज़ा मिलने के बाद अब पीड़ित परिवारों और विपक्षी दलों की माँग है कि सुरक्षा व्यवस्था में हुई कथित चूक की स्वतंत्र जाँच हो। यह मामला छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक संवेदनशील और विवादास्पद अध्याय बना हुआ है।