झीरम घाटी नरसंहार: टीएस सिंह देव का दावा — हमले के दिन मार्ग पर एक भी सुरक्षाकर्मी नहीं था
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने बुधवार, 16 सितंबर को दावा किया कि 25 मई 2013 के झीरम घाटी नक्सली हमले वाले दिन पार्टी नेताओं के कार्यक्रम स्थल तक जाने वाले मार्ग पर एक भी सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं था। यह बयान ऐसे समय में आया है जब जगदलपुर स्थित राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने इस नरसंहार मामले में 10 दोषियों को फाँसी की सज़ा सुनाई है।
मुख्य घटनाक्रम
अंबिकापुर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सिंह देव ने कहा, 'फाँसी की सज़ा से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती। कौन-कौन से नक्सली इस हमले में शामिल थे और कौन नहीं थे, यह अलग विषय है — यह जाँच का मामला है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उस पाँच-छह दिवसीय कार्यक्रम के प्रभारी थे और उन्होंने डीजीपी कार्यालय से लेकर आईजी स्तर तक सभी संबंधित अधिकारियों को लिखित सूचना देकर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने का अनुरोध किया था।
सिंह देव के अनुसार, 'कार्यक्रम की जानकारी प्रशासन को दी गई थी और उसके अनुसार पहले दो दिनों तक पूरी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई गई।' उन्होंने बताया कि पहले दिन बीजापुर और दूसरे दिन जगदलपुर के कार्यक्रम में सुरक्षा में कोई कमी नहीं थी।
तीसरे दिन सुरक्षा क्यों गायब हुई
सिंह देव ने दावा किया कि तीसरे दिन स्थिति पूरी तरह बदल गई। उन्होंने कहा, 'जब मैं निर्धारित समय से करीब आधा घंटा पहले निकला — क्योंकि नंद कुमार पटेल का कार्यक्रम था और अध्यक्ष होने के नाते मुझे सुकमा पहुँचना था — तब मैंने देखा कि सड़क पर एक भी पुलिसकर्मी नहीं था, न कोई सुरक्षा बल तैनात था और न ही रास्ते में कोई रोक-टोक थी।'
उन्होंने बताया कि सुकमा तक की यात्रा पूरी तरह सामान्य और शांतिपूर्ण रही। उनके अनुसार, 'सुकमा पहुँचने से पहले पुलिस कैंप के पास कुछ लोग दिखाई दिए, लेकिन वकावनघाटी में एक भी अधिकारी तैनात नहीं था।' सुकमा में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी रास्ते में कहीं कोई सुरक्षा बल नज़र नहीं आया।
सिंह देव के सवाल और आरोप
सिंह देव ने तीखे सवाल उठाते हुए कहा, 'यह कैसे हुआ? वही व्यवस्था, जिसने पहले दो दिनों तक हमें पूरी सुरक्षा दी, तीसरे दिन अचानक क्यों नदारद हो गई? और फिर यह दुखद घटना घट गई।' उनका यह बयान सुरक्षा चूक की ओर इशारा करता है, हालाँकि उन्होंने किसी पर सीधा आरोप नहीं लगाया।
गौरतलब है कि 25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के काफिले पर हमला किया गया था, जिसमें 29 लोगों की मौत हुई थी। यह छत्तीसगढ़ के इतिहास का सबसे बड़ा नक्सली हमला था, जिसमें पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मारे गए थे।
अदालत का फैसला और जाँच की माँग
NIA की विशेष अदालत ने इस मामले में 10 दोषियों को फाँसी की सज़ा सुनाई है, जो इस जघन्य हत्याकांड में न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सिंह देव ने कहा कि इस पूरे मामले के कई पहलुओं की जाँच होना अभी भी आवश्यक है। यह ऐसे समय में आया है जब झीरम घाटी नरसंहार की जाँच को लेकर राजनीतिक विवाद वर्षों से जारी है और विपक्ष सहित कई पक्ष व्यापक जाँच की माँग करते रहे हैं।
आगे क्या होगा
सिंह देव के ताज़ा बयान से यह मामला एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी चर्चा के केंद्र में आ गया है। 10 दोषियों को फाँसी की सज़ा के बाद अपील की संभावना बनी हुई है, जबकि सुरक्षा चूक के सवाल पर अलग जाँच की माँग तेज़ हो सकती है। यह देखना होगा कि सरकार और जाँच एजेंसियाँ इन नए सवालों पर क्या रुख अपनाती हैं।