राम मंदिर ट्रस्ट CEO नियुक्ति पर BJP-कांग्रेस में जुबानी जंग, सुधांशु त्रिवेदी बोले — सेना का अपमान कांग्रेस की पहचान
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने 3 सितंबर 2026 को लखनऊ में पत्रकारों से बात करते हुए कांग्रेस नेता राशिद अल्वी की उस टिप्पणी पर कड़ा पलटवार किया, जो रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किए जाने के बाद आई थी। त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि सशस्त्र बलों का अपमान करना कांग्रेस की स्थायी पहचान बन चुकी है।
नियुक्ति पर क्या है विवाद
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने सवाल उठाया था कि एक रिटायर्ड एयर चीफ मार्शल का राम मंदिर ट्रस्ट के CEO पद से क्या संबंध है। अल्वी ने यह भी कहा था कि मौजूदा सरकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राज्यपाल या राज्यसभा सदस्य बनाती है, जिससे लोगों में संदेह पैदा होता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 'ऑपरेशन सिंदूर' से जुड़ा कोई छिपा हुआ सच इस नियुक्ति के पीछे हो सकता है।
सुधांशु त्रिवेदी का पलटवार
त्रिवेदी ने अल्वी के बयान को 'दिमागी नक्सलवाद' की संज्ञा दी और कहा कि यह कांग्रेस की उसी मानसिकता को उजागर करता है जो दशकों से सशस्त्र बलों को संदेह की नज़र से देखती आई है। उन्होंने तर्क दिया कि सैन्य पृष्ठभूमि के अनुभवी अधिकारी की नियुक्ति से ट्रस्ट के कामकाज में अनुशासन, पारदर्शिता और कार्यक्षमता बढ़ेगी।
त्रिवेदी ने पंचतंत्र की 'बगुला भगत' की कहानी का उल्लेख करते हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि जो लोग पहले भगवान राम के अस्तित्व और अयोध्या की ऐतिहासिकता पर सवाल उठाते थे, वही अब राम मंदिर से जुड़े हर फैसले पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सेना के मुद्दे पर कांग्रेस पर निशाना
सशस्त्र बलों के प्रति कांग्रेस के रवैये पर सवाल उठाते हुए त्रिवेदी ने पार्टी नेताओं के पुराने बयानों का हवाला दिया। उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक के सबूत माँगने के मुद्दे को याद दिलाया। साथ ही, कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित द्वारा तत्कालीन सेना प्रमुख के संदर्भ में की गई कथित टिप्पणी और पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा से मुलाकात के मुद्दे को भी उन्होंने उठाया।
ऐतिहासिक संदर्भ और BJP का तर्क
त्रिवेदी ने दावा किया कि गजनवी, मोहम्मद गोरी और बाबर केवल लूट के लिए नहीं, बल्कि मंदिरों को नष्ट करने और मूर्तियाँ तोड़ने के उद्देश्य से भारत आए थे। उन्होंने अलबरूनी, उत्बी, फरिश्ता और मिनहाज-उस-सिराज जैसे ऐतिहासिक लेखकों के विवरणों का हवाला देते हुए इस दावे को पुष्ट करने की कोशिश की।
आगे क्या
यह राजनीतिक वाकयुद्ध ऐसे समय में सामने आया है जब राम मंदिर ट्रस्ट अपनी प्रशासनिक संरचना को औपचारिक रूप दे रहा है। गौरतलब है कि CEO जैसे पेशेवर पद की नियुक्ति ट्रस्ट के संस्थागतकरण की दिशा में एक नया कदम है, और इस पर आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और तेज़ होने की संभावना है।