ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा 2026: दुर्लभ संयोग में दान-जप से मिलेगा हजारों गुना पुण्य
सारांश
मुख्य बातें
ज्येष्ठ अधिकमास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि इस बार शनिवार, 29 मई को पड़ रही है — और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह संयोग अत्यंत दुर्लभ है। पद्म पुराण में उल्लिखित मान्यता के अनुसार, इस तिथि पर किया गया दान, जप और व्रत सामान्य पूर्णिमाओं की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है।
अधिकमास का महत्व
पद्म पुराण के अनुसार, अधिकमास का आगमन प्रत्येक तीन वर्ष में केवल एक बार होता है। इसीलिए इसे 'मलमास' या 'पुरुषोत्तम मास' भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस पावन मास की पूर्णिमा 'सर्वसिद्धिदायिनी' होती है — अर्थात यह हर प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, पवित्र नदियों में स्नान और दान करने का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई हजार गुना अधिक बताया गया है।
शुभ मुहूर्त और ग्रह स्थिति
द्रिक पंचांग के अनुसार, इस शनिवार सूर्य वृषभ राशि में और चंद्रमा तुला राशि में विराजमान रहेंगे। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 51 मिनट से 12 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। वहीं, राहुकाल का समय सुबह 8 बजकर 51 मिनट से 10 बजकर 35 मिनट तक रहेगा — इस अवधि में शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं।
पूजा विधि
इस दिन विशेष पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यकर्म के बाद यदि संभव हो तो जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके पश्चात स्वच्छ या पीले वस्त्र धारण कर घर के मंदिर में गंगाजल का छिड़काव करें। एक चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। श्री हरि को फूल, फल, चंदन, अक्षत, धूप-दीप और भोग में तुलसी पत्ती अवश्य अर्पित करें। सत्यनारायण कथा का पाठ करें तथा 'विष्णु सहस्रनाम' या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें।
दान का विशेष महत्व
ज्येष्ठ मास में भीषण गर्मी के कारण इस पूर्णिमा पर जल से भरी मटकी (घड़ा), सत्तू, आम, खरबूजा, पंखा, वस्त्र या अन्न का दान विशेष रूप से महापुण्यदायी माना जाता है। किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य बताया गया है। यह तिथि भगवान नारायण (विष्णु) को समर्पित है और इस दिन उपवास रखने से घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि होती है — ऐसी धार्मिक मान्यता है।
आगे क्या
अधिकमास की यह पूर्णिमा श्रद्धालुओं के लिए तीन वर्षों में एक बार आने वाला दुर्लभ अवसर है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, इस दिन किया गया हर शुभ कर्म — चाहे वह जप हो, व्रत हो या दान — आने वाले समय में विशेष फल देने वाला माना जाता है।