कदीमी मस्जिद विवाद: ओवैसी का केंद्र पर हमला, बोले 'सरकार को मस्जिद से एलर्जी है'
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने 4 नवंबर 2026 को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला, जब सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में नई दिल्ली के कृषि भवन परिसर स्थित 100 वर्ष पुरानी कदीमी मस्जिद को हटाने की माँग की। ओवैसी ने कहा कि सरकार को 'मस्जिद से एलर्जी है', और केंद्र के धर्मनिरपेक्षता संबंधी तर्क को खोखला बताया।
ओवैसी का एक्स पर पोस्ट और तर्क
असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया है कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट (CCS) के पुनर्विकास के लिए कृषि भवन परिसर की कदीमी मस्जिद को हटाना अनिवार्य है।
उन्होंने अपने पोस्ट में सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा, 'मोदी सरकार ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का उद्घाटन भूमि पूजा के साथ किया। साफ है, सेक्युलरिज्म को किसी पब्लिक प्रोजेक्ट के लिए एक धर्म के रीति-रिवाजों के इस्तेमाल से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उसे एक ऐसी मस्जिद से एलर्जी है जो 1912 से भी पहले से, कृषि भवन के बनने से बहुत पहले से वहाँ मौजूद है।'
केंद्र सरकार का हलफनामा: मुख्य तर्क
केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि कृषि भवन और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट परिसर धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक प्रतिष्ठान हैं, जो विशेष रूप से सरकारी और प्रशासनिक कार्यों के लिए समर्पित हैं।
सरकार ने तर्क दिया कि किसी भी केंद्रीय सरकारी कार्यालय परिसर की सीमा के भीतर स्थायी धार्मिक ढाँचा स्थापित करना, बनाए रखना या उस पर दावा करना, सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के विपरीत है। साथ ही यह भी कहा गया कि CCS बिल्डिंग 4 और 5 का पुनर्विकास सेंट्रल विस्टा मास्टर प्लान का अहम हिस्सा है और मस्जिद की मौजूदगी इस राष्ट्रीय महत्व की परियोजना के क्रियान्वयन में बाधक है।
वैकल्पिक नमाज़ की सुविधा का दावा
अपने हलफनामे में केंद्र ने यह भी बताया कि कृषि भवन के आसपास दो किलोमीटर के दायरे में शाही मस्जिद जाब्तागंज स्थित है, जो आसपास के किसी भी व्यक्ति को नमाज़ की पूरी सुविधा देने में सक्षम है। सरकार का कहना है कि इसे देखते हुए परिसर के भीतर अलग मस्जिद की कोई आवश्यकता नहीं रहती।
ऐतिहासिक और कानूनी संदर्भ
गौरतलब है कि कदीमी मस्जिद की उपस्थिति 1912 से पहले की बताई जाती है, यानी यह इमारत कृषि भवन के निर्माण से भी पहले से उस भूखंड पर थी। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब सेंट्रल विस्टा परियोजना अपने विभिन्न चरणों में सक्रिय रूप से आगे बढ़ रही है और देश में धार्मिक स्थलों और सरकारी भूमि के उपयोग को लेकर बहस जारी है। यह पहली बार नहीं है जब सेंट्रल विस्टा किसी विवाद के केंद्र में आया हो — इससे पहले भी इस परियोजना पर कई संवैधानिक और नागरिक चुनौतियाँ लगाई जा चुकी हैं।
आगे क्या होगा
मामला अब दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। अदालत दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद अपना निर्णय सुनाएगी। ओवैसी सहित विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों की नज़र इस मामले पर बनी हुई है, और इसका असर व्यापक धार्मिक-राजनीतिक विमर्श पर भी पड़ सकता है।