केआरएस जलाशय संकट: भाजपा का आरोप — कर्नाटक सरकार ने सूखे की कोई तैयारी नहीं की, किसानों से बैठक भी नहीं
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने 4 जुलाई को मांड्या स्थित केआरएस (कृष्णराजसागर) जलाशय का दौरा किया और मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर सूखे से निपटने की कोई तैयारी न करने तथा प्रभावित किसानों के साथ एक भी बैठक न बुलाने का आरोप लगाया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने माँग की है कि सरकार प्रभावित किसानों को तत्काल ₹50,000 प्रति एकड़ का मुआवज़ा दे।
केआरएस जलाशय की मौजूदा स्थिति
अशोक ने पत्रकारों को बताया कि इस समय केआरएस जलाशय में केवल 6 टीएमसी पानी शेष है और आवक मात्र 900 क्यूसेक की दर से हो रही है। उन्होंने आशंका जताई कि जितना पानी आ रहा है, उससे अधिक बाहर छोड़ा जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पीने के पानी की ज़रूरत प्रति माह 3 टीएमसी है, जो मौजूदा भंडार को देखते हुए चिंताजनक स्थिति में है।
अशोक ने दावा किया कि मुख्यमंत्री शिवकुमार के कार्यभार संभालने के एक महीने के भीतर ही राज्य के सभी प्रमुख जलाशय सूखने की कगार पर पहुँच गए हैं। हालाँकि सरकार की ओर से इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तत्काल नहीं आई।
किसानों पर असर और बुवाई की स्थिति
अधिकारियों के अनुसार, इस मौसम में अब तक केवल 5 प्रतिशत बुवाई ही हो पाई है। इसके बावजूद, अशोक ने बताया कि किसानों ने 1 लाख एकड़ से अधिक भूमि पर फसलें बो दी हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर मुख्यमंत्री किसानों को फसल न उगाने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर किसान पहले ही बुवाई कर चुके हैं — जो सरकार और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करता है।
अशोक ने सरकार पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल संरक्षण की अपील की थी, तब कांग्रेस ने उसकी कड़ी आलोचना की थी — और अब वही सरकार किसानों को वही सलाह दे रही है।
भाजपा की मुआवज़े की माँग
अशोक ने माँग की कि सरकार को तत्काल प्रभाव से किसानों को ₹50,000 प्रति एकड़ का मुआवज़ा देना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि भाजपा के शासनकाल में इससे दोगुना मुआवज़ा दिया गया था। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री को किसान नेताओं की बैठक बुलाकर फसल और जल प्रबंधन पर विचार-विमर्श करना चाहिए था।
इसके बजाय, उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कचरा निपटान और सुरंग सड़क जैसी परियोजनाओं की निविदाएँ आमंत्रित करने में व्यस्त है, जबकि किसान संकट में हैं।
तमिलनाडु प्रसंग और राजनीतिक तीखापन
अशोक ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यदि राज्य सरकार में साहस होता, तो वह तमिलनाडु के किसानों को भी फसल न उगाने की सलाह देती। यह टिप्पणी कावेरी जल विवाद की पृष्ठभूमि में महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।
गौरतलब है कि कर्नाटक में सूखे की स्थिति और जलाशयों का घटता जलस्तर हर वर्ष राजनीतिक विवाद का केंद्र बनता है। इस बार विपक्ष ने ज़मीनी दौरे के ज़रिये सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई है। आने वाले हफ्तों में मानसून की प्रगति और जलाशय स्तर ही यह तय करेंगे कि सरकार पर राजनीतिक दबाव और बढ़ता है या कम होता है।