लोकसभा में 'केरल (नाम परिवर्तन) बिल 2026' पास, अब केरल कहलाएगा 'केरलम'
सारांश
मुख्य बातें
लोकसभा में 11 अगस्त 2026 को विपक्षी सांसदों की जोरदार नारेबाजी के बीच 'केरल (नाम परिवर्तन) बिल, 2026' को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। इस विधेयक के ज़रिये संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन कर केरल राज्य का नाम बदलकर 'केरलम' किया जाएगा — जो मलयालम भाषा में राज्य का परंपरागत नाम है।
सदन में क्या हुआ
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन में यह बिल पेश किया। इसी दौरान विपक्षी सांसद 20 जुलाई को नीट प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति और बयान की माँग को लेकर नारेबाजी करते रहे। सदन की अध्यक्षता कर रहे कृष्णा प्रसाद टेनेटी ने विपक्षी सदस्यों से सदन को सुचारू रूप से चलने देने का आग्रह किया, लेकिन हंगामा नहीं थमा।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर बिल पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, 'यह दुखद है कि केसी वेणुगोपाल जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी इस बिल पर नहीं बोलेंगे।' अंततः बिना किसी विधिवत चर्चा के ध्वनि मत से विधेयक पारित कर दिया गया।
मंत्रिमंडल और विधानसभा की पृष्ठभूमि
यह बिल एक लंबी विधायी प्रक्रिया की परिणति है। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'केरल' का नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इससे भी पहले 24 जून 2024 को केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत यह नाम परिवर्तन करने की अपील की थी।
उस प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया था कि 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के समय से मलयालम भाषी लोगों के लिए 'संयुक्त केरल' की माँग रही है, और मलयालम में राज्य का नाम सदा से 'केरलम' ही रहा है। 1 नवंबर को 'केरल पिरवी दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
संवैधानिक प्रक्रिया
नाम परिवर्तन के लिए संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन आवश्यक है, जो अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। केरल सरकार ने भी केंद्र को आधिकारिक अनुरोध भेजा था कि इस संशोधन के लिए तत्काल कदम उठाए जाएँ। लोकसभा में पारित होने के बाद अब यह बिल राज्यसभा में जाएगा, और वहाँ से पारित होने पर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने बिल का सीधा विरोध नहीं किया, लेकिन नीट मुद्दे पर गृह मंत्री की जवाबदेही की माँग को लेकर सदन में व्यवधान उत्पन्न किया। इस कारण बिल पर कोई विधिवत बहस नहीं हो सकी। आलोचकों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन को बिना चर्चा के पारित करना संसदीय परंपराओं के अनुकूल नहीं है।
आगे क्या होगा
लोकसभा से पारित होने के बाद बिल को राज्यसभा की मंजूरी और तत्पश्चात राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता होगी। इसके बाद संविधान की पहली अनुसूची में 'केरल' की जगह 'केरलम' दर्ज होगा — और यह नाम परिवर्तन आधिकारिक रूप से प्रभावी हो जाएगा।