संयुक्त किसान मोर्चा ने राज्यपाल कटारिया को सौंपा ज्ञापन, पानी में यूरेनियम और कर्जमाफी पर उठाई आवाज़
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त किसान मोर्चा ने 19 जून को चंडीगढ़ में पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा, जिसमें पेयजल में यूरेनियम की मौजूदगी, किसानों पर बढ़ता कर्ज, कैंसर के बढ़ते मामले और डैम सेफ्टी एक्ट जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक बलबीर सिंह राजेवाल ने पत्रकारों से बातचीत में इस मुलाकात का ब्यौरा दिया।
पानी में यूरेनियम और कैंसर का संकट
राजेवाल ने बताया कि किसानों को मिलने वाले पानी में यूरेनियम और हेवी मेटल की मौजूदगी पाई गई है, जिसे ज्ञापन में प्रमुखता से उठाया गया है। उन्होंने कहा कि पंजाब में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और पिछले वर्ष स्वयं जल मंत्री ने अपने भाषण में स्वीकार किया था कि 'पंजाब कैंसर स्टेट' के रूप में तब्दील हो रहा है। मोर्चे की माँग है कि हर शहर और हर गाँव में स्वच्छ पेयजल और कृषि के लिए पर्याप्त पानी सुनिश्चित किया जाए।
किसानों के कर्ज और सरकारी नीतियों पर सवाल
राजेवाल ने कहा कि किसानों पर कर्ज का बोझ कोई नई समस्या नहीं है — आज़ादी से पहले लिखी एक किताब में भी यह दर्ज था कि 'यहाँ का किसान कर्ज में पैदा होता है और कर्ज में ही मर जाता है।' उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार कॉरपोरेट घरानों के कर्ज माफ कर सकती है, तो किसानों और मजदूरों के कर्ज क्यों नहीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 2007-2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के कार्यकाल में गठित कृषि अर्थशास्त्रियों की समिति की रिपोर्ट के बावजूद केंद्र सरकार ने गेहूँ और धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य कम रखकर किसानों का नुकसान किया।
डैम सेफ्टी एक्ट और बीबीएमबी विवाद
मोर्चे ने डैम सेफ्टी एक्ट को वापस लेने की माँग दोहराई। राजेवाल ने कहा कि भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) में पंजाब और हरियाणा के किसानों का प्रतिनिधित्व रहा है, लेकिन अब पंजाब को बाहर कर राजस्थान को शामिल किया गया है, जिसका वे विरोध करते हैं। इसके अलावा, किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के सरकारी वादे का अब तक पालन न होने पर भी ज्ञापन में आपत्ति जताई गई है।
राज्यपाल का आश्वासन
राजेवाल के अनुसार, राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने उन्हें बताया कि वे 26 जून को दिल्ली जाएँगे और वहाँ किसानों के ज्ञापन में उठाए गए मुद्दों का उल्लेख करके समाधान की दिशा में प्रयास करेंगे। यह देखना होगा कि इस आश्वासन के बाद सरकार की ओर से कोई ठोस कदम उठाया जाता है या नहीं।
व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि संयुक्त किसान मोर्चा 1984 में भी राजभवन का घेराव कर चुका है, जिसके बाद जवाहर कमेटी का गठन हुआ था। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार फ्री ट्रेड समझौतों की दिशा में कदम बढ़ा रही है और किसान संगठनों को आशंका है कि इससे कृषि क्षेत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।