किसानों को मुआवजे में मिल रही कमी: राज्यसभा में उठाया गया मामला
सारांश
Key Takeaways
- किसानों को मुआवजे में कमी हो रही है।
- मौजूदा स्थिति से किसान परेशान हैं।
- सरकार से मांग की गई है कि बीमा दावों का समय पर निपटान किया जाए।
- फसल का फिजिकल वेरिफिकेशन समय पर होना चाहिए।
- बीमा कंपनियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
नई दिल्ली, १३ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने शुक्रवार को सदन में किसानों की फसल बीमा योजना से संबंधित मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि बीमा कंपनियां किसानों को पूर्ण और सही मुआवजा नहीं दे रही हैं। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, जो देश के करोड़ों किसानों को प्रभावित करता है।
उन्होंने बताया कि कई राज्यों के उदाहरण इस योजना की गंभीर खामियों को उजागर करते हैं। महाराष्ट्र में जब किसानों की फसल खराब हुई, तब मुआवजे के रूप में किसी के खाते में २१ रुपये, किसी के खाते में ८ रुपये और कुछ किसानों के खाते में तो केवल ३ रुपये ही आए।
राजीव शुक्ला ने सवाल उठाया कि ३ रुपये से किसान क्या कर सकेगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का नाम तो हम सबने सुना है, लेकिन इसे उन उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया था कि किसान कम प्रीमियम देकर प्राकृतिक आपदाओं से अपनी फसल को सुरक्षित रख सकेंगे।
उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में आई बाढ़ ने धान की फसल को प्रभावित किया। किसानों ने बीमा का दावा किया, लेकिन मुआवजे के नाम पर किसी के खाते में ३.७६ रुपये और किसी के खाते में २.६२ रुपये आए।
राजीव शुक्ला ने यह भी बताया कि किसान इन छोटी राशियों से नई फसल नहीं बो सकते, डीजल नहीं ले सकते और न ही कीटनाशक खरीद सकते हैं। वे सोचते होंगे कि इतनी राशि में तो मोबाइल रिचार्ज भी नहीं होता।
उन्होंने कहा कि समस्या केवल धन की नहीं है। कई बार फसल का फिजिकल वेरिफिकेशन समय पर नहीं होता और अधिकारी तब पहुंचते हैं जब फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी होती है। कई बार किसान चक्कर लगाते-लगाते थक जाते हैं, लेकिन उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिलता।
राजीव शुक्ला ने कहा कि किसान डेढ़ से दो प्रतिशत प्रीमियम देता है, लेकिन बीमा कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये का प्रीमियम मिलता है। जब दावों की संख्या कम होती है, तब कंपनियों का लाभ बढ़ता है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि बीमा दावों के निपटान और भुगतान की स्पष्ट समयसीमा तय की जाए और फसल नुकसान का समय पर सर्वेक्षण सुनिश्चित किया जाए।