केपीएससी भंग करने पर कुमारस्वामी का सीएम शिवकुमार पर हमला: 'मूर्खता और अज्ञानता की पराकाष्ठा'
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने बुधवार, 23 सितंबर 2026 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर तीखा प्रहार किया, जब शिवकुमार ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) को कानून बनाकर बंद करने के विकल्पों पर विचार करने की बात कही। कुमारस्वामी ने इस बयान को न केवल गैर-जिम्मेदाराना बल्कि एक संवैधानिक रूप से संरक्षित संस्था की संरचना और भूमिका की गहरी अनभिज्ञता का परिचायक बताया।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह टकराव उस बयान के एक दिन बाद सामने आया, जो मुख्यमंत्री शिवकुमार ने मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को दिया था। उन्होंने कहा था कि कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती घोटाले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आदेश देने के बाद उनकी सरकार केपीएससी को बंद करने के कानूनी विकल्प तलाश रही है। इस बयान ने विपक्षी खेमे में हलचल मचा दी।
गौरतलब है कि केपीएससी एक संवैधानिक संस्था है, जिसे सीधे भंग करना संवैधानिक और कानूनी दृष्टि से जटिल प्रक्रिया है। कुमारस्वामी ने इसी बिंदु को आधार बनाकर शिवकुमार के बयान को 'अज्ञानता' की संज्ञा दी।
कुमारस्वामी के तर्क
कुमारस्वामी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के लिए संस्था को नहीं, बल्कि उन लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए जिन्होंने गलत काम किया। उन्होंने सवाल उठाया कि इन कथित दोषियों को किसने नियुक्त किया और किसने उन्हें काम करने की छूट दी।
केंद्रीय मंत्री ने एक सटीक उपमा देते हुए कहा, 'अगर खेत में खरपतवार उग आती है, तो उसे उखाड़ देना चाहिए — पूरे खेत में ज़हर नहीं डालना चाहिए।' उनका आग्रह था कि दोषियों की पहचान करके उन्हें हटाया जाए, न कि पूरी संस्था को ही समाप्त किया जाए।
संवैधानिक स्थिति पर ज़ोर
कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री शिवकुमार से अपील की कि वे ऐसा कोई भी बयान देने से पहले आयोग की संवैधानिक स्थिति, उसकी संरचना और ऐतिहासिक भूमिका को भली-भाँति समझ लें। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि आयोग के भीतर कुछ व्यक्तियों के कृत्यों के चलते उसे बंद करना उचित माना जाए, तो उसी तर्क को उन बड़ी संस्थाओं पर भी लागू करना होगा जिन्होंने इन लोगों को नियुक्त किया।
यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार कई मोर्चों पर दबाव में है और प्रशासनिक सुधारों की मांग तेज़ है। विपक्ष इस मामले को राज्य सरकार की प्रशासनिक विफलता के रूप में रेखांकित कर रहा है।
राजनीतिक अर्थ और आगे की राह
कुमारस्वामी का यह हमला महज एक संवैधानिक बहस नहीं है — इसके पीछे कर्नाटक की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी स्पष्ट है। वे जनता दल (सेक्युलर) के प्रमुख नेता हैं और कर्नाटक में कांग्रेस के कड़े विरोधी रहे हैं। उनके इस बयान से राज्य सरकार पर केपीएससी सुधारों के मुद्दे पर जवाब देने का दबाव बढ़ेगा। आने वाले दिनों में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह भर्ती घोटाले में दोषियों के खिलाफ क्या ठोस कार्रवाई करती है।