10 अगस्त 2026
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नारियल खेती संकट: मजदूरों की कमी से कोयंबटूर-तिरुप्पुर में उत्पादन लागत 50% बढ़ी

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नारियल खेती संकट: मजदूरों की कमी से कोयंबटूर-तिरुप्पुर में उत्पादन लागत 50% बढ़ी

सारांश

पश्चिमी तमिलनाडु में नारियल की खेती दोहरे संकट में है — प्रवासी मजदूरों के न लौटने से छिलका उतारने की लागत 50% और कटाई की लागत 33% बढ़ गई है। छोटे किसान सबसे बुरी तरह प्रभावित हैं और कॉयर उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला भी खतरे में है।

मुख्य बातें

कोयंबटूर और तिरुप्पुर जिलों में नारियल छिलका उतारने की लागत पिछले दो महीनों में ₹1 से बढ़कर ₹1.50 प्रति नारियल ( 50% वृद्धि ) हो गई।
नारियल तोड़ने (पेड़ चढ़ाई) की दर ₹2.25 से बढ़कर ₹3 प्रति नारियल हो गई है।
चुनाव के बाद प्रवासी मजदूरों के वापस न लौटने को मजदूर संकट की प्रमुख वजह माना जा रहा है।
छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित; बड़े व्यापारियों को मजदूर मिलना अपेक्षाकृत आसान।
कॉयर और कॉयर-पिथ उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला भी प्रभावित होने का खतरा।
यांत्रिक विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन उच्च लागत के कारण छोटे किसानों की पहुँच से बाहर।

कोयंबटूर और तिरुप्पुर जिलों के नारियल किसान 23 जून 2026 तक तेज़ी से बढ़ती उत्पादन लागत की मार झेल रहे हैं, क्योंकि श्रमशक्ति की गंभीर कमी के चलते छिलका उतारने और कटाई दोनों पर खर्च में भारी उछाल आया है। पश्चिमी तमिलनाडु के इस प्रमुख नारियल उत्पादक क्षेत्र में किसानों का कहना है कि यह संकट केवल मौसमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक है।

मजदूरी लागत में उछाल

पिछले दो महीनों में नारियल से छिलका उतारने की दर ₹1 से बढ़कर ₹1.50 प्रति नारियल हो गई है — यानी 50 प्रतिशत की सीधी बढ़ोतरी। इसी तरह, पेड़ पर चढ़कर नारियल तोड़ने का खर्च ₹2.25 से बढ़कर ₹3 प्रति नारियल हो गया है। किसानों के अनुसार, ये दरें पिछले कुछ हफ्तों में ही इस स्तर पर पहुँची हैं।

किसानों का मानना है कि चुनावी मौसम में अपने गृह राज्यों को लौटे अनेक प्रवासी मजदूर वापस नहीं आए, जिससे श्रम की उपलब्धता और घट गई। यह भी कहा जा रहा है कि इनमें से कुछ मजदूरों को अन्य क्षेत्रों में बेहतर रोज़गार के अवसर मिल गए या वे दूसरे स्थानों पर स्थायी रूप से बस गए।

छोटे किसानों पर सबसे ज़्यादा असर

इस संकट की सबसे ज़्यादा मार छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ रही है, जो खेती के लगभग सभी कार्यों के लिए मजदूरों पर निर्भर रहते हैं और जिनकी मोल-भाव करने की क्षमता सीमित है। बड़े व्यापारी और थोक खरीदार अपेक्षाकृत आसानी से मजदूर जुटा लेते हैं, जबकि अकेले किसानों और छोटे उत्पादकों को ऊँची दरें चुकानी पड़ रही हैं।

उद्योग जानकारों का कहना है कि यदि मजदूरी की बढ़ी हुई लागत यूँ ही बनी रही, तो इसका असर बाज़ार में नारियल की खुदरा कीमतों पर भी पड़ सकता है।

पेड़ चढ़ाई कौशल का संकट

नारियल के पेड़ पर चढ़ने में दक्ष मजदूरों की संख्या लगातार घट रही है। पुरानी पीढ़ी के कुशल मजदूर धीरे-धीरे सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जबकि युवा पीढ़ी इस शारीरिक रूप से कठिन और जोखिम भरे काम में रुचि नहीं दिखा रही। यह एक दीर्घकालिक संरचनात्मक समस्या है, जो अल्पकालिक उपायों से हल होने की संभावना कम है।

गौरतलब है कि ऊँचे नारियल के पेड़ों वाले बागानों में यांत्रिक कटाई उपकरण भी पूरी तरह कारगर नहीं होते।

कॉयर उद्योग पर व्यापक असर

मजदूरों की यह कमी केवल खेत तक सीमित नहीं है। नारियल के छिलके कॉयर और कॉयर-पिथ उद्योगों के लिए अनिवार्य कच्चा माल हैं, जो उत्पादकों और व्यापारियों से निरंतर आपूर्ति पर निर्भर करते हैं। छिलकों की प्रोसेसिंग लागत बढ़ने या आपूर्ति बाधित होने से इन संबद्ध उद्योगों का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है, जो ग्रामीण रोज़गार का एक बड़ा आधार हैं।

यांत्रिकीकरण: समाधान या दूर का सपना?

जानकारों का कहना है कि कटाई और छिलका उतारने के लिए यांत्रिक विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन अधिक प्रारंभिक निवेश और व्यावहारिक बाधाओं के कारण छोटे किसानों के बीच इनका प्रसार अभी बेहद सीमित है। यदि श्रम संकट जारी रहा, तो सरकारी सब्सिडी या सहकारी मशीनीकरण योजनाएँ ही इस क्षेत्र को राहत दे सकती हैं।

मजदूरों की उपलब्धता में सुधार के कोई ठोस संकेत न मिलने से किसानों को आशंका है कि आने वाले महीनों में उत्पादन लागत और बढ़ेगी — जिससे तमिलनाडु के सबसे अहम कृषि क्षेत्रों में से एक की लाभप्रदता और कम हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि वर्षों से चली आ रही संरचनात्मक उपेक्षा का परिणाम है — जहाँ कृषि क्षेत्र में कौशल हस्तांतरण और यांत्रिकीकरण की नीतियाँ कागज़ों पर ही रहीं। प्रवासी मजदूरों पर अत्यधिक निर्भरता एक पुरानी कमज़ोरी है, जिसे चुनावी चक्र ने बस उजागर कर दिया। असली सवाल यह है कि राज्य सरकार की कृषि सब्सिडी और मशीनीकरण योजनाएँ छोटे किसानों तक पहुँचने में क्यों विफल रही हैं — और क्या कॉयर उद्योग के संकट को देखते हुए अब भी नीतिगत हस्तक्षेप में देरी उचित है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोयंबटूर में नारियल उत्पादन लागत क्यों बढ़ी है?
मजदूरों की भारी कमी के कारण छिलका उतारने और कटाई की दरें तेज़ी से बढ़ी हैं। माना जा रहा है कि चुनाव के बाद प्रवासी मजदूरों का वापस न लौटना और पेड़ चढ़ाई में दक्ष कुशल मजदूरों की घटती संख्या इसकी मुख्य वजह है।
नारियल छिलका उतारने की दर कितनी बढ़ी है?
पिछले दो महीनों में यह दर ₹1 से बढ़कर ₹1.50 प्रति नारियल हो गई है, जो 50 प्रतिशत की वृद्धि है। इसी अवधि में पेड़ चढ़कर नारियल तोड़ने की दर ₹2.25 से बढ़कर ₹3 प्रति नारियल हो गई है।
इस संकट से सबसे ज़्यादा कौन प्रभावित है?
छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित हैं क्योंकि वे सभी कृषि कार्यों के लिए मजदूरों पर निर्भर हैं और उनकी मोल-भाव करने की क्षमता सीमित है। बड़े व्यापारी और थोक खरीदार तुलनात्मक रूप से आसानी से मजदूर जुटा पाते हैं।
क्या नारियल की कटाई के लिए मशीनी विकल्प उपलब्ध हैं?
जानकारों के अनुसार कटाई और छिलका उतारने के यांत्रिक समाधान मौजूद हैं, लेकिन अधिक प्रारंभिक निवेश लागत और व्यावहारिक बाधाओं के कारण छोटे किसानों के बीच इनका उपयोग अभी बेहद सीमित है। अत्यधिक ऊँचे पेड़ों पर ये उपकरण कम प्रभावी भी होते हैं।
नारियल की इस समस्या का कॉयर उद्योग पर क्या असर पड़ेगा?
नारियल के छिलके कॉयर और कॉयर-पिथ उद्योगों के लिए अनिवार्य कच्चा माल हैं। यदि छिलकों की प्रोसेसिंग लागत बढ़ती रही या आपूर्ति बाधित हुई, तो इन उद्योगों का उत्पादन प्रभावित होगा और ग्रामीण रोज़गार पर भी असर पड़ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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