नीलगिरि में 55% बारिश की कमी से चाय उत्पादन आधा, किसानों पर दोहरी मार
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के नीलगिरि जिले में दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 के दौरान 55 प्रतिशत से अधिक वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जिससे चाय बागानों में मिट्टी की नमी तेज़ी से घट गई है और हरी पत्तियों का उत्पादन अभूतपूर्व रूप से गिर गया है। छोटे चाय उत्पादकों के अनुसार, यह पिछले 15 वर्षों में दक्षिण-पश्चिम मानसून सीज़न की सबसे गंभीर वर्षा कमी है।
उत्पादन में गिरावट का दायरा
उत्पादकों का कहना है कि जिन बागानों से सामान्यतः प्रति एकड़ प्रति माह लगभग 500 किलोग्राम हरी पत्तियाँ मिलती थीं, वहाँ अब केवल 200 किलोग्राम के आसपास उत्पादन हो रहा है — यानी 60 प्रतिशत तक की गिरावट। मौजूदा सीज़न में समग्र पैदावार में 10 से 20 प्रतिशत की गिरावट पहले ही आ चुकी है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आने वाले हफ्तों में वर्षा नहीं हुई, तो वार्षिक औसत पैदावार — जो सामान्यतः 7 से 8 टन प्रति एकड़ आँकी जाती है — 50 प्रतिशत तक गिर सकती है।
लंबे समय तक नमी की कमी से लगातार कटाई के बीच का अंतराल भी बढ़ रहा है, जिससे प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों को हरी पत्तियों की आपूर्ति और कम हो जाएगी।
किसानों पर आर्थिक दबाव
पैदावार में भारी गिरावट के बावजूद खरीद मूल्य ₹20 प्रति किलोग्राम से नीचे ही बना हुआ है, जिससे किसानों को कोई विशेष राहत नहीं मिल रही। जानकारों का कहना है कि चाय की खरीद कीमतें मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की परिस्थितियों से निर्धारित होती हैं, इसलिए स्थानीय उत्पादन में कमी का सीधा असर स्थानीय कीमतों पर नहीं पड़ता।
कुछ किसानों ने सूखे से बागानों को बचाने के लिए स्प्रिंकलर सिंचाई का सहारा लिया है, परंतु सिंचाई उपकरण खरीदने और चलाने की लागत अधिकांश छोटे उत्पादकों की पहुँच से बाहर है, जो नीलगिरि के चाय क्षेत्र की रीढ़ हैं।
'सुपर अल नीनो' और मौसमी विश्लेषण
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस असाधारण वर्षा कमी के पीछे 'सुपर अल नीनो' का प्रभाव कथित तौर पर प्रमुख कारण है। यह ऐसे समय में आया है जब ऊटी और गुडलूर के बागान दक्षिण-पश्चिम मानसून पर सर्वाधिक निर्भर हैं, जो सामान्यतः जून से अगस्त तक सक्रिय रहता है। कोटागिरी को दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व — दोनों मानसून का लाभ मिलता है, जबकि कूनूर में अधिकांश वर्षा उत्तर-पूर्व मानसून के दौरान होती है।
गौरतलब है कि बीच-बीच में हुई छिटपुट बारिश ने बागानों को कुछ समय के लिए राहत दी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षा की कमी का पूरा असर तब सामने आएगा जब सूखा और लंबा खिंचा।
उत्तर-पूर्व मानसून पर टिकी उम्मीदें
दक्षिण-पश्चिम मानसून के समाप्त होने के साथ, नीलगिरि के चाय उत्पादक अब उत्तर-पूर्व मानसून से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बागानों में मिट्टी की नमी बहाल करने, पैदावार को पटरी पर लाने और आगे के नुकसान को रोकने के लिए आने वाले सीज़न में पर्याप्त वर्षा होना अनिवार्य है। यदि उत्तर-पूर्व मानसून भी सामान्य से कम रहा, तो नीलगिरि का चाय उद्योग इस वर्ष गंभीर संकट में पड़ सकता है।