सिंधु नदी पर देश का पहला रॉक चेक डैम: लद्दाख के उपशी में उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने किया उद्घाटन
सारांश
मुख्य बातें
लद्दाख के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने 27 मई 2026 को लेह के उपशी में सिंधु नदी पर भारत के पहले पर्यावरण-अनुकूल रॉक चेक डैम का उद्घाटन किया। यह ऐतिहासिक संरचना 'सिंधु जल समृद्धि अभियान' के अंतर्गत बनाई गई है, जिसमें न सीमेंट का उपयोग हुआ और न ही कंक्रीट का — केवल नदी के किनारे उपलब्ध प्राकृतिक पत्थरों को आपस में जोड़कर यह ढाँचा तैयार किया गया है।
क्या है यह रॉक चेक डैम
उपराज्यपाल सक्सेना ने बताया कि यह विचार उन्होंने स्वयं अपने अधिकारियों के सामने रखा था — सिंधु नदी के उन हिस्सों में जहाँ पानी उथला बहता है, वहाँ जल संचयन की संभावना तलाशने के लिए। इसके बाद अधिकारियों के साथ मिलकर योजना बनाई गई, स्थान का चयन किया गया और नदी के आसपास के बड़े पत्थरों को उठाकर आपस में फँसाते हुए यह डैम तैयार किया गया।
निर्माण के दौरान उस स्थान पर पानी की गहराई मात्र एक से डेढ़ फीट थी। डैम बन जाने के बाद किनारों पर जल-स्तर 4.5 से 5 फीट और बीच में 10 से 12 फीट तक पहुँच गया है। जल संचयन का क्षेत्र लगभग 500 मीटर तक फैल गया है, और इसमें अब करीब 4.5 करोड़ लीटर पानी जमा हो रहा है।
पर्यावरणीय और कृषि महत्व
इस डैम का उद्देश्य केवल जल संचयन तक सीमित नहीं है। अभियान का व्यापक लक्ष्य लद्दाख में दीर्घकालिक जल सुरक्षा और टिकाऊ कृषि को मज़बूती देना है। गौरतलब है कि लद्दाख जैसे ऊँचाई वाले ठंडे रेगिस्तान में पानी की उपलब्धता कृषि और आजीविका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यह ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं और पारंपरिक जल स्रोत कमज़ोर पड़ रहे हैं।
सौंदर्य और तकनीकी नवाचार
उपराज्यपाल सक्सेना ने इस डैम की एक और विशेषता का उल्लेख किया — इसकी संरचना से एक प्राकृतिक 'कैस्केडिंग इफेक्ट' यानी झरने जैसा प्रभाव उत्पन्न हो रहा है। उन्होंने कहा, "पूरे लद्दाख की नदियों को देखें, तो आमतौर पर आपको इस तरह का झरना देखने को नहीं मिलता। पानी की आवाज़ इतनी मधुर है।" यह पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
आगे की योजना
उपराज्यपाल ने संकेत दिया कि इस मॉडल को और परिष्कृत किया जाएगा। उन्होंने विशेषज्ञों और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को इस डैम का निरीक्षण करने और सुझाव देने के लिए आमंत्रित किया है। उनका कहना है कि फिलहाल यह डैम स्थानीय इंजीनियरों की समझ और तकनीक पर आधारित है, और बाहरी विशेषज्ञों के सुझावों से इसे और बेहतर बनाया जाएगा। भविष्य में इस तकनीक को लद्दाख की अन्य नदियों पर भी लागू करने की संभावना है।