4 नवंबर 2026
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मद्रास हाईकोर्ट ने अजित कुमार हिरासत मौत मामले में चार पुलिसकर्मियों की रिमांड याचिका खारिज की, 9 महीने में ट्रायल पूरा करने का आदेश

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मद्रास हाईकोर्ट ने अजित कुमार हिरासत मौत मामले में चार पुलिसकर्मियों की रिमांड याचिका खारिज की, 9 महीने में ट्रायल पूरा करने का आदेश

सारांश

मद्रास हाईकोर्ट ने अजित कुमार हिरासत मौत मामले में चार पुलिसकर्मियों की रिमांड बरकरार रखते हुए उनकी याचिकाएँ खारिज कर दीं। CBI जांच, साक्ष्य से छेड़छाड़ के आरोप और गवाह सुरक्षा की चिंताओं के बीच अदालत ने 9 महीने में ट्रायल पूरा करने का निर्देश दिया — तमिलनाडु में पुलिस जवाबदेही की एक अहम कड़ी।

मुख्य बातें

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने 4 नवंबर 2026 को चार पुलिसकर्मियों की रिमांड विरोधी याचिकाएँ खारिज कीं।
मंदिर सुरक्षा गार्ड बी.
अजित कुमार (29 वर्ष) की 28 जून 2025 को पुलिस हिरासत में कथित तौर पर मौत हुई थी।
CBI ने 20 अगस्त 2025 को छह पुलिसकर्मियों के खिलाफ और 12 दिसंबर 2025 को चार और अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए।
आरोपियों पर सबूत नष्ट करने, जनरल डायरी में हेराफेरी और परिवार से समझौते का प्रयास करने के आरोप हैं।
न्यायालय ने निचली अदालत को 9 महीने के भीतर मुकदमा पूरा करने का आदेश दिया।
अभियोजन पक्ष ने प्रमुख गवाह नवीन कुमार (अजित के भाई) की पुलिस सुरक्षा वापस लिए जाने पर चिंता जताई।

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने 4 नवंबर 2026 को मंदिर सुरक्षा गार्ड बी. अजित कुमार की हिरासत में मौत के मामले में चार पुलिसकर्मियों द्वारा दायर न्यायिक रिमांड विरोधी याचिकाएँ खारिज कर दीं। साथ ही अदालत ने निचली अदालत को नौ महीने के भीतर मुकदमे की कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया। 29 वर्षीय अजित कुमार की कथित तौर पर जून 2025 में पुलिस पूछताछ के दौरान घातक चोटें लगने से मृत्यु हो गई थी।

मामले का मुख्य घटनाक्रम

मदपुरम भद्रकाली अम्मन मंदिर में कार्यरत अजित कुमार को 28 जून 2025 को एक कथित आभूषण चोरी की जांच कर रही विशेष पुलिस टीम ने हिरासत में लिया था, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस मामले ने पूरे तमिलनाडु में हिरासत हिंसा के खिलाफ व्यापक आक्रोश पैदा किया और राज्य सरकार को जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने के लिए बाध्य होना पड़ा।

CBI ने 20 अगस्त 2025 को छह पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्रारंभिक आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद 12 दिसंबर 2025 को चार अतिरिक्त अधिकारियों को नामजद करते हुए पूरक आरोप पत्र दाखिल किया गया।

किन पुलिसकर्मियों पर क्या आरोप

न्यायमूर्ति मुरुगन ने चार पुलिसकर्मियों — मनमदुरै के पूर्व पुलिस उपाधीक्षक इन. शन्मुगसुंदरम, तिरुप्पुवनम के पूर्व निरीक्षक एसपी रमेश कुमार, विशेष उप-निरीक्षक एस. शिवकुमार और हेड कांस्टेबल जी. इलैयाराजा — की याचिकाएँ खारिज कीं। इन चारों ने मदुरै स्थित अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय के 16 सितंबर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के तहत हत्या सहित आरोप तय किए गए थे।

निचली अदालत ने आरोप लगाया था कि इन अधिकारियों ने सबूत दबाने के लिए पुलिस रिकॉर्ड में हेराफेरी की, जनरल डायरी प्रविष्टियों में बदलाव किए और मोबाइल फोन नष्ट किए। जांचकर्ताओं के अनुसार, शन्मुगसुंदरम ने स्थानीय राजनीतिक मध्यस्थों के जरिए पीड़ित के परिवार के साथ समझौता करने का प्रयास भी किया।

आरोपियों और पीड़ित पक्ष की दलीलें

याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने अदालत में तर्क दिया कि वे निरंतर निचली अदालत के समक्ष उपस्थित हुए, जांचकर्ताओं के साथ सहयोग किया और पहले गिरफ्तारी से न्यायिक सुरक्षा प्राप्त कर चुके थे, इसलिए बाद की रिमांड अनुचित थी।

दूसरी ओर, अजित कुमार के परिवार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने रिहाई का विरोध करते हुए आशंका जताई कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं और मुकदमे में बाधा डाल सकते हैं। अभियोजन पक्ष ने यह भी चिंता व्यक्त की कि महत्वपूर्ण गवाह एवं अजित कुमार के भाई नवीन कुमार को दी गई पुलिस सुरक्षा वापस ली जा रही है।

हाईकोर्ट का फैसला और आगे की राह

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मद्रास उच्च न्यायालय ने चारों की रिमांड बरकरार रखते हुए याचिकाएँ खारिज कर दीं। अदालत ने निचली अदालत को नौ महीने की समय सीमा में मुकदमे की कार्यवाही पूरी करने का स्पष्ट निर्देश दिया।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में हिरासत हिंसा के मामलों को लेकर न्यायपालिका की सक्रिय निगरानी की माँग बढ़ रही है। गौरतलब है कि यह मामला तमिलनाडु में पुलिस जवाबदेही को लेकर एक बड़े विमर्श का हिस्सा बन चुका है। अदालत के इस आदेश से पीड़ित परिवार को उम्मीद की किरण मिली है कि मुकदमा तय समय में तार्किक अंजाम तक पहुँचेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि साक्ष्य से छेड़छाड़ और समझौते के प्रयासों के बावजूद जांच एजेंसी इतने महीनों तक गवाह सुरक्षा सुनिश्चित करने में क्यों चूकती रही। नवीन कुमार की पुलिस सुरक्षा वापस लिए जाने की चिंता यह भी उजागर करती है कि संस्थागत दबाव अभी भी पीड़ित पक्ष पर है। नौ महीने की समय सीमा स्वागत योग्य है, परंतु तमिलनाडु में इससे पहले के हिरासत मौत मामलों में देरी का इतिहास रहा है। बिना गवाह सुरक्षा के ठोस तंत्र के, समय सीमा का आदेश अधूरा साबित हो सकता है।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बी. अजित कुमार हिरासत मौत मामला क्या है?
29 वर्षीय मंदिर सुरक्षा गार्ड बी. अजित कुमार की 28 जून 2025 को मदुरै में एक कथित आभूषण चोरी मामले की जांच के दौरान पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। इस मामले ने तमिलनाडु में हिरासत हिंसा के खिलाफ व्यापक आक्रोश पैदा किया और सरकार ने CBI जांच के आदेश दिए।
मद्रास हाईकोर्ट ने 4 नवंबर 2026 को क्या आदेश दिया?
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने चार आरोपी पुलिसकर्मियों द्वारा न्यायिक रिमांड को चुनौती देने वाली याचिकाएँ खारिज कर दीं और रिमांड बरकरार रखी। साथ ही निचली अदालत को नौ महीने के भीतर मुकदमे की कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया।
इस मामले में CBI ने क्या कार्रवाई की है?
CBI ने 20 अगस्त 2025 को छह पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्रारंभिक आरोप पत्र दाखिल किया। 12 दिसंबर 2025 को चार और अधिकारियों को नामजद करते हुए पूरक आरोप पत्र दाखिल किया गया, जिसमें कुल 10 पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के तहत हत्या का आरोप शामिल है।
आरोपी पुलिसकर्मियों पर क्या-क्या आरोप हैं?
निचली अदालत के अनुसार, आरोपी अधिकारियों ने सबूत दबाने के लिए पुलिस रिकॉर्ड में हेराफेरी की, जनरल डायरी प्रविष्टियाँ बदलीं और मोबाइल फोन नष्ट किए। पूर्व DSP शन्मुगसुंदरम पर राजनीतिक मध्यस्थों के जरिए पीड़ित के परिवार से समझौते का प्रयास करने का भी आरोप है।
गवाह सुरक्षा को लेकर क्या चिंताएँ हैं?
अभियोजन पक्ष ने अदालत में बताया कि अजित कुमार के भाई और प्रमुख गवाह नवीन कुमार को दी गई पुलिस सुरक्षा वापस ली जा रही है, जो मुकदमे की निष्पक्षता के लिए खतरा हो सकता है। परिवार के वकील ने भी आशंका जताई कि आरोपी रिहा होने पर गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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