महाराष्ट्र के 184 स्मारकों के संरक्षण को गति, मंत्री शेलार ने ₹441 करोड़ की योजना की समीक्षा की
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य भर के किलों, प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण को नई रफ्तार देने का फैसला किया है। सांस्कृतिक मामलों के मंत्री आशीष शेलार की अध्यक्षता में मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को हुई उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जिला वार्षिक योजना (सामान्य) के तहत आवंटित धनराशि का तीन प्रतिशत हिस्सा संरक्षण कार्यों में लगाने की सुविधा को वित्त वर्ष 2026-27 तक जारी रखा जाएगा। पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के माध्यम से राज्य के 184 स्मारकों के लिए अनुमानित ₹441.14 करोड़ की तकनीकी मंजूरी दी जा चुकी है।
मुख्य घटनाक्रम
बैठक में सिंधुदुर्ग जिले के तीन प्रमुख किलों — नंदोस किला, भगवंतगढ़ और सिद्धगढ़ — के संरक्षण को लेकर अहम निर्णय लिए गए। नंदोस किले में एक साइट म्यूज़ियम स्थापित किया जाएगा, जिसका प्रबंधन स्थानीय ग्राम पंचायत के हाथों में होगा। भगवंतगढ़ के लिए आधुनिक तकनीक से डिजिटल सर्वे की प्रशासनिक मंजूरी दी जाएगी, जिसके बाद विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार होगी।
सिद्धगढ़ को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित करने की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू कर दी गई है। मंत्री शेलार ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया के पूरा होने तक किले के परिसर में किसी भी अवैध खुदाई या खनन को रोकने के लिए एहतियाती आदेश जारी किए गए हैं।
वित्तीय प्रगति का ब्यौरा
जिला वार्षिक योजना के अंतर्गत 184 स्मारकों के लिए ₹441.14 करोड़ की तकनीकी मंजूरी दी गई है। इनमें से 161 कार्यों को ₹372.34 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है। 52 कार्य — जिनकी लागत ₹105.61 करोड़ है — पूरे हो चुके हैं, जबकि ₹184.68 करोड़ के 108 कार्य अभी प्रगति पर हैं।
विभागीय फंड के माध्यम से अलग से ₹627.62 करोड़ के 108 कार्यों को मंजूरी दी गई है। इनमें से 16 कार्य पूरे हो चुके हैं और 86 कार्य जारी हैं। गौरतलब है कि यह महाराष्ट्र सरकार की सांस्कृतिक विरासत के प्रति अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धताओं में से एक है।
सरकार की प्राथमिकताएँ
मंत्री आशीष शेलार ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जिला वार्षिक योजना और विभागीय आवंटन — दोनों स्रोतों से मिलने वाले फंड का उपयोग संरक्षण कार्यों में तेज़ी से किया जाए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि विरासत स्थलों का संरक्षण केवल पर्यटन की दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।
यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र के कई किले — विशेषकर सह्याद्री और कोंकण क्षेत्र के — मानसून की मार और अनधिकृत गतिविधियों से क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल सर्वे जैसी आधुनिक पद्धतियाँ संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक बदलाव हैं।
बैठक में कौन शामिल हुए
इस बैठक में सांस्कृतिक मामलों के विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय के निदेशक तेजस गर्गे, संबंधित जिलों के अधिकारी और स्थानीय जन-प्रतिनिधि उपस्थित थे। आगे चलकर इन कार्यों की नियमित समीक्षा की जाएगी।