खड़गे के बयान पर संसद में घमासान: भाजपा का पलटवार, कांग्रेस का बचाव, सपा ने छात्र मुद्दा उठाया
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक विवादास्पद बयान ने 30 जुलाई को संसद के भीतर और बाहर तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी। केंद्रीय मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेताओं ने खड़गे के वक्तव्य पर कड़ी आपत्ति जताई, जबकि कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा कि उनके शब्दों का संदर्भ से बाहर अर्थ निकाला जा रहा है। समाजवादी पार्टी (SP) ने इस पूरे विवाद को छात्रों की समस्याओं से जोड़कर सरकार को घेरा।
भाजपा मंत्रियों की तीखी प्रतिक्रिया
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने आरोप लगाया कि खड़गे ने पेपर लीक विधेयक पर चर्चा के दौरान कोई सार्थक बात नहीं की और अपशब्दों का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि खड़गे सदन में मनुस्मृति की एक नकली प्रति लेकर आए और यह कहा कि 'मैं उन्हें यहाँ घसीटकर लाऊंगा।' सिंह ने स्पष्ट किया कि भाजपा का स्पष्ट संदेश है कि समाज में किसी भी स्तर पर विभाजन की राजनीति नहीं होनी चाहिए।
केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने खड़गे को नसीहत देते हुए कहा कि उन्हें सरकार की कुर्सी की चिंता करने की बजाय कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। अठावले ने कहा कि केंद्र सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है और उसे किसी प्रकार की अस्थिरता की आशंका नहीं है। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि संसदीय मर्यादा की बार-बार याद दिलाने के बावजूद राहुल नियमों के अनुरूप नहीं चले।
भाजपा सांसदों का रुख
भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि सरकार ने पूरे मामले में संयम बनाए रखा और समय-समय पर सभी आवश्यक कदम उठाए। उनके अनुसार, देश की जनता ने सरकार के रवैये को समझा है और खड़गे के मौजूदा बयान का कोई विशेष राजनीतिक महत्व नहीं है।
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने राज्यसभा की कार्यवाही को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने कहा कि पेपर लीक विधेयक पर चर्चा के दौरान खड़गे ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विरुद्ध अत्यंत आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया, जिसके बाद भाजपा सांसदों के कड़े विरोध के चलते खड़गे को अपने बयान में संशोधन करना पड़ा। त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व की यह भाषा उनकी मानसिकता को उजागर करती है और जनता लगातार ऐसे रवैये को नकार रही है।
कांग्रेस का पक्ष
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने खड़गे का बचाव करते हुए कहा कि उनके बयान में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था। तिवारी के अनुसार खड़गे का आशय केवल यह था कि जहाँ सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है, वहाँ वह उपस्थित नहीं है, और जब जनशक्ति सत्ता परिवर्तन करेगी तो सरकार को हटना ही पड़ेगा। तिवारी ने इसे एक सामान्य लोकतांत्रिक वक्तव्य बताया जिसे जानबूझकर तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।
सपा ने छात्र आंदोलन से जोड़ा मुद्दा
समाजवादी पार्टी के सांसद वीरेंद्र सिंह ने इस विवाद को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा। उन्होंने कहा कि सदन के भीतर दो नेताओं के बीच हुई बातचीत को उसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि छात्रों की समस्याओं पर समय रहते ध्यान दिया जाता, उनके आंदोलनों को गंभीरता से लिया जाता, तो न लाठीचार्ज की नौबत आती और न ही देश में तनाव का यह माहौल बनता।
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब संसद का सत्र पहले से ही विभिन्न विधेयकों को लेकर गतिरोध का सामना कर रहा है। गौरतलब है कि पेपर लीक विधेयक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहस के दौरान इस प्रकार की भाषाई तीखापन संसदीय मर्यादा पर सवाल खड़े करती है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों पक्ष संवाद की राह अपनाते हैं या यह टकराव और गहरा होता है।