शहीद दिवस रैली पर 60 दिनों की निषेधाज्ञा: ममता गुट ने कलकत्ता हाईकोर्ट में दी चुनौती
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के ममता बनर्जी नेतृत्व वाले गुट ने सोमवार, 13 जुलाई को कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल पीठ में याचिका दाखिल कर कोलकाता पुलिस की उस अधिसूचना को चुनौती दी, जिसमें एस्प्लेनेड चौराहे के निकट सीईएससी हाउस के सामने 60 दिनों के लिए चार या अधिक व्यक्तियों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगाया गया है। यह स्थल तृणमूल कांग्रेस की वार्षिक शहीद दिवस रैली का परंपरागत आयोजन-स्थान रहा है, और इस वर्ष 21 जुलाई को वहाँ रैली प्रस्तावित है।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने याचिका स्वीकार कर ली है और अगली सुनवाई 15 जुलाई को निर्धारित की है। कोलकाता पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 के तहत यह अधिसूचना जारी की थी। उल्लेखनीय है कि प्रतिबंध की अवधि में 21 जुलाई का वह दिन भी शामिल है जब तृणमूल कांग्रेस का शहीद दिवस कार्यक्रम आयोजित होना है।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं तृणमूल कांग्रेस के चार बार के लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी ने इस आदेश को 'मनमाना' और 'मौलिक अधिकारों के विपरीत' करार दिया। उनका तर्क है कि यह निषेधाज्ञा विशेष रूप से शहीद दिवस रैली को बाधित करने के इरादे से लागू की गई है, क्योंकि इसकी समय-सीमा और स्थान का चुनाव संयोगवश नहीं है।
पार्टी में विभाजन की पृष्ठभूमि
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब तृणमूल कांग्रेस दो गुटों में बँट चुकी है। एक ओर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाला अल्पमत गुट है, तो दूसरी ओर पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बहुमत वाला विद्रोही गुट है। वर्ष 2025 तक पार्टी की शहीद दिवस रैली सीईएससी हाउस के सामने ही आयोजित होती रही थी।
दूसरे गुट की तैयारी
ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को 21 जुलाई को जवाहरलाल नेहरू रोड पर महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने वैकल्पिक स्थल पर रैली आयोजित करने की अनुमति मिल चुकी है। इस प्रकार एक ही तिथि को दो अलग-अलग स्थानों पर शहीद दिवस रैलियाँ आयोजित होने की स्थिति बन सकती है, जो TMC की आंतरिक दरार को और गहरा उजागर करेगी।
आगे क्या होगा
अब सभी की निगाहें 15 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय यह तय करेगा कि ममता बनर्जी के गुट को सीईएससी हाउस के सामने रैली की अनुमति मिलती है या नहीं। यह फैसला न केवल इस वर्ष की रैली, बल्कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पुलिस की निषेधाज्ञा शक्तियों की सीमाओं को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है।