6 अगस्त 2026
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मनोज जरांगे का महाराष्ट्र सरकार पर आरोप: कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करना सोची-समझी साजिश

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मनोज जरांगे का महाराष्ट्र सरकार पर आरोप: कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करना सोची-समझी साजिश

सारांश

मराठा नेता मनोज जरांगे पाटिल ने महाराष्ट्र सरकार पर मराठवाड़ा की चार महिला जनप्रतिनिधियों के कुनबी प्रमाणपत्र रद्द कराने की साजिश का आरोप लगाया है। CM फडणवीस ने हस्तक्षेप से इनकार किया और सर्वोच्च न्यायालय-निर्देशित स्वायत्त प्रक्रिया का हवाला दिया।

मुख्य बातें

मनोज जरांगे पाटिल ने 6 अगस्त 2026 को जालना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर महाराष्ट्र सरकार पर कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करने की साजिश का आरोप लगाया।
मराठवाड़ा की चार महिला मराठा जनप्रतिनिधियों के कुनबी जाति प्रमाणपत्र जाति जांच समिति ने रद्द किए।
जरांगे पाटिल ने आरोप लगाया कि राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने चुनाव हारने के बाद अधिकारियों को फोन कर प्रमाणपत्र रद्द करवाए।
CM देवेंद्र फडणवीस ने किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से इनकार किया; कहा — जाति जांच समिति सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत स्वायत्त रूप से काम करती है।
समिति नियमित रूप से 10–12% प्रमाणपत्र अस्वीकार करती है, गैर-कुनबी ओबीसी मामलों में यह दर 25% तक जाती है।
जरांगे पाटिल ने चेतावनी दी — ' 2029 में सबसे बड़ा बदला लेंगे।'

मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता मनोज जरांगे पाटिल ने 6 अगस्त 2026 को जालना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान महाराष्ट्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि मराठवाड़ा की चार महिला मराठा जनप्रतिनिधियों के कुनबी जाति प्रमाणपत्र रद्द किया जाना एक सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र है, जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से जुड़े मंत्रियों की भूमिका होने का दावा उन्होंने किया।

मुख्य आरोप और दस्तावेज़ी दावे

जरांगे पाटिल ने मीडिया के सामने दस्तावेज़ प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने पहले जानबूझकर प्रमाणपत्र जारी किए और बाद में उन्हें रद्द करवाया — यह सब मराठा समुदाय को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करने की रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने विशेष रूप से ज्योति शिंदे का मामला उठाया और दावा किया कि उनका प्रमाणपत्र राजनीतिक दुर्भावना के चलते निरस्त किया गया।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने चुनाव हारने के बाद अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से फोन कर प्रमाणपत्र रद्द करने के निर्देश दिए। जरांगे पाटिल ने कहा, 'हमारे द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे सबूतों जितने सबूत किसी भी सरकारी अधिकारी के पास नहीं हैं। वैध प्रमाणपत्रों को फर्जी क्यों बताया जा रहा है?'

राजनीतिक चेतावनी

जरांगे पाटिल ने सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि मराठों द्वारा चुनी गई यह सरकार उन्हीं के साथ विश्वासघात कर रही है। उन्होंने घोषणा की, '2029 में हम सबसे बड़ा बदला लेंगे।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब मराठा आरक्षण का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से उबाल पर है और जरांगे पाटिल इस आंदोलन के सबसे मुखर चेहरे बने हुए हैं।

सरकार की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि जाति जांच समिति सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत एक स्वायत्त निकाय के रूप में कार्य करती है और राज्य सरकार उसके कामकाज में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करती। उन्होंने पत्रकारों से कहा, 'मैंने जरांगे पाटिल की पूरी टिप्पणी नहीं सुनी है, लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जब प्रमाणपत्र जाति जांच समिति के पास जाते हैं, तो वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित नियमों के तहत कार्य करते हैं।'

फडणवीस ने बताया कि समिति विभिन्न श्रेणियों में नियमित रूप से 10 से 12 प्रतिशत प्रमाणपत्र अस्वीकार करती है, जो कभी-कभी गैर-कुनबी ओबीसी प्रमाणपत्रों के मामले में 10 से 25 प्रतिशत तक पहुँच जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रमाणपत्र जानबूझकर अस्वीकार नहीं किया जा रहा।

आम जनता और समुदाय पर असर

गौरतलब है कि कुनबी प्रमाणपत्र मराठा समुदाय के लिए ओबीसी आरक्षण का प्रवेशद्वार माना जाता है। इन प्रमाणपत्रों के रद्द होने से प्रभावित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर सीधा असर पड़ता है। यह पहली बार नहीं है जब मराठा आरक्षण विवाद ने राज्य सरकार और आंदोलनकारियों के बीच टकराव को जन्म दिया हो — पिछले कई वर्षों से यह मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति का केंद्र बना हुआ है।

आगे क्या होगा

जरांगे पाटिल ने संकेत दिया है कि वे इस मुद्दे पर आंदोलन तेज़ करेंगे और कानूनी विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही जाति जांच प्रक्रिया और इस विवाद के बीच सामंजस्य बिठाना राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

असली सवाल यह है कि जाति जांच समिति की अस्वीकृति दर — जो कुछ श्रेणियों में 25% तक है — क्या वाकई सर्वोच्च न्यायालय-निर्धारित मानकों पर आधारित है या इसमें प्रशासनिक विवेकाधिकार का दुरुपयोग हो रहा है? सरकार का 'स्वायत्त निकाय' वाला तर्क तब तक पर्याप्त नहीं होगा जब तक समिति की निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी न हो। मराठा आरक्षण विवाद बार-बार इसीलिए भड़कता है क्योंकि कुनबी प्रमाणपत्र की वैधता का कोई स्पष्ट, सार्वजनिक मापदंड नहीं है। 2029 के चुनावी दांव को देखते हुए यह विवाद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक निहितार्थ रखता है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मनोज जरांगे पाटिल ने महाराष्ट्र सरकार पर क्या आरोप लगाए हैं?
जरांगे पाटिल ने आरोप लगाया है कि सरकार ने पहले जानबूझकर कुनबी जाति प्रमाणपत्र जारी किए और बाद में राजनीतिक दुर्भावना से उन्हें रद्द करवाया। उनका कहना है कि यह मराठा समुदाय को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करने की सुनियोजित साजिश है।
कुनबी प्रमाणपत्र क्यों महत्वपूर्ण है और इसे रद्द करने से क्या फर्क पड़ता है?
कुनबी प्रमाणपत्र मराठा समुदाय के लिए ओबीसी आरक्षण का आधार है। इसके रद्द होने से प्रभावित जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक और सरकारी लाभों तक पहुँच प्रभावित होती है, जिससे समुदाय में व्यापक असंतोष है।
CM देवेंद्र फडणवीस ने जरांगे के आरोपों पर क्या कहा?
मुख्यमंत्री फडणवीस ने किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से इनकार किया और कहा कि जाति जांच समिति सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत स्वायत्त रूप से कार्य करती है। उन्होंने बताया कि समिति नियमित रूप से 10 से 12 प्रतिशत प्रमाणपत्र अस्वीकार करती है।
राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले पर क्या आरोप लगे हैं?
जरांगे पाटिल ने आरोप लगाया कि बावनकुले ने चुनाव हारने के बाद अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से फोन कर कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करने के निर्देश दिए। सरकार की ओर से इस आरोप पर अभी तक कोई विस्तृत खंडन सामने नहीं आया है।
इस विवाद का 2029 के चुनावों पर क्या असर हो सकता है?
जरांगे पाटिल ने सीधे कहा है कि 2029 में मराठा समुदाय 'सबसे बड़ा बदला' लेगा, जो सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए स्पष्ट राजनीतिक चेतावनी है। मराठा वोट बैंक महाराष्ट्र में निर्णायक माना जाता है और यह विवाद आगामी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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