मनोज जरांगे का महाराष्ट्र सरकार पर आरोप: कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करना सोची-समझी साजिश
सारांश
मुख्य बातें
मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता मनोज जरांगे पाटिल ने 6 अगस्त 2026 को जालना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान महाराष्ट्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि मराठवाड़ा की चार महिला मराठा जनप्रतिनिधियों के कुनबी जाति प्रमाणपत्र रद्द किया जाना एक सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र है, जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से जुड़े मंत्रियों की भूमिका होने का दावा उन्होंने किया।
मुख्य आरोप और दस्तावेज़ी दावे
जरांगे पाटिल ने मीडिया के सामने दस्तावेज़ प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने पहले जानबूझकर प्रमाणपत्र जारी किए और बाद में उन्हें रद्द करवाया — यह सब मराठा समुदाय को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करने की रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने विशेष रूप से ज्योति शिंदे का मामला उठाया और दावा किया कि उनका प्रमाणपत्र राजनीतिक दुर्भावना के चलते निरस्त किया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने चुनाव हारने के बाद अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से फोन कर प्रमाणपत्र रद्द करने के निर्देश दिए। जरांगे पाटिल ने कहा, 'हमारे द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे सबूतों जितने सबूत किसी भी सरकारी अधिकारी के पास नहीं हैं। वैध प्रमाणपत्रों को फर्जी क्यों बताया जा रहा है?'
राजनीतिक चेतावनी
जरांगे पाटिल ने सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि मराठों द्वारा चुनी गई यह सरकार उन्हीं के साथ विश्वासघात कर रही है। उन्होंने घोषणा की, '2029 में हम सबसे बड़ा बदला लेंगे।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब मराठा आरक्षण का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से उबाल पर है और जरांगे पाटिल इस आंदोलन के सबसे मुखर चेहरे बने हुए हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि जाति जांच समिति सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत एक स्वायत्त निकाय के रूप में कार्य करती है और राज्य सरकार उसके कामकाज में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करती। उन्होंने पत्रकारों से कहा, 'मैंने जरांगे पाटिल की पूरी टिप्पणी नहीं सुनी है, लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जब प्रमाणपत्र जाति जांच समिति के पास जाते हैं, तो वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित नियमों के तहत कार्य करते हैं।'
फडणवीस ने बताया कि समिति विभिन्न श्रेणियों में नियमित रूप से 10 से 12 प्रतिशत प्रमाणपत्र अस्वीकार करती है, जो कभी-कभी गैर-कुनबी ओबीसी प्रमाणपत्रों के मामले में 10 से 25 प्रतिशत तक पहुँच जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रमाणपत्र जानबूझकर अस्वीकार नहीं किया जा रहा।
आम जनता और समुदाय पर असर
गौरतलब है कि कुनबी प्रमाणपत्र मराठा समुदाय के लिए ओबीसी आरक्षण का प्रवेशद्वार माना जाता है। इन प्रमाणपत्रों के रद्द होने से प्रभावित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर सीधा असर पड़ता है। यह पहली बार नहीं है जब मराठा आरक्षण विवाद ने राज्य सरकार और आंदोलनकारियों के बीच टकराव को जन्म दिया हो — पिछले कई वर्षों से यह मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति का केंद्र बना हुआ है।
आगे क्या होगा
जरांगे पाटिल ने संकेत दिया है कि वे इस मुद्दे पर आंदोलन तेज़ करेंगे और कानूनी विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही जाति जांच प्रक्रिया और इस विवाद के बीच सामंजस्य बिठाना राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी रहेगी।