क्या बिहार चुनाव में आरक्षण के बाद मसौढ़ी सीट का समीकरण बदला?

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क्या बिहार चुनाव में आरक्षण के बाद मसौढ़ी सीट का समीकरण बदला?

सारांश

मसौढ़ी विधानसभा सीट की राजनीतिक स्थिति में आरक्षण के बाद महत्वपूर्ण बदलाव आया है। यहाँ राजद और जदयू के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी। क्या यह सीट फिर से राजद के पक्ष में जाएगी? जानिए इस महत्वपूर्ण सीट की कहानी और इसके पीछे की राजनीति।

मुख्य बातें

मसौढ़ी विधानसभा सीट में आरक्षण के बाद राजनीतिक समीकरण बदले हैं।
राजद और जदयू के बीच सीधी टक्कर हो रही है।
यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।
स्थानीय मुद्दों में स्वास्थ्य और शिक्षा प्रमुख हैं।
मसौढ़ी का ऐतिहासिक महत्व भी है।

पटना, 25 अक्टूबर (राष्ट्र प्रेस)। बिहार की राजधानी पटना के दक्षिण में स्थित मसौढ़ी का इतिहास न केवल दिलचस्प है, बल्कि इसका वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य भी काफी महत्वपूर्ण है। यह स्थान पहले 'तारेगना' के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ है- 'तारों की गणना करना'। कहा जाता है कि इस पवित्र भूमि पर भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने छठी शताब्दी में एक खगोल वेधशाला की स्थापना की थी। यहां प्राचीन मणिचक सूर्य मंदिर भी मौजूद है।

लेकिन आज मसौढ़ी केवल तारों और प्राचीन वेधशाला के लिए नहीं, बल्कि वोटों की गिनती के लिए भी जानी जाती है। यह बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से एक है, जो पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र के अधीन आती है और पटना जिले का एक प्रमुख उप-मंडल है।

पिछले एक दशक में, मसौढ़ी विधानसभा सीट पर राजद का वर्चस्व रहा है। यह सीट अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है और राजद की उम्मीदवार रेखा देवी यहां की लगातार दो बार की विधायक हैं।

2020 के विधानसभा चुनाव में, मसौढ़ी ने एकतरफा परिणाम दिया। राजद की उम्मीदवार रेखा देवी ने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की उम्मीदवार नूतन पासवान को भारी अंतर से हराया था। रेखा देवी को कुल 98,696 वोट प्राप्त हुए थे।

पहले इसे 'स्विंग सीट' माना जाता था, लेकिन 2008 में परिसीमन आयोग की सिफारिशों के बाद इसे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। इससे यह राजद और जदयू के बीच एक प्रमुख लड़ाई का केंद्र बन गई। राजद की लगातार सफलता के पीछे यहां के यादव और दलित मतदाताओं का मजबूत समीकरण है।

हालांकि, मसौढ़ी राजनीतिक दृष्टि से एक मजबूत गढ़ है, लेकिन यहां के लोगों की चुनौतियां कम नहीं हैं। यह क्षेत्र मुख्यतः कृषि आधारित है। स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे यहां के दो बड़े और अनसुलझे मुद्दे हैं। मसौढ़ी में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, लेकिन विशेषज्ञ अस्पतालों की कमी है। वहीं, हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या कम है, जिसके कारण अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए शहरों की ओर भेजने को मजबूर हैं।

मसौढ़ी अनुमंडल, मसौढ़ी और धनरुआ विकासखंडों से मिलकर बना है। यह क्षेत्र प्राचीन पुनपुन नदी के किनारे बसा है, जिसके आसपास दरधा और मोरहर जैसी नदियां भी बहती हैं।

2011 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार, मसौढ़ी अनुमंडल की कुल जनसंख्या 2,41,216 थी। उस समय साक्षरता दर मात्र 53.04 प्रतिशत थी और लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 916 महिलाएं थीं। पटना से निकटता के कारण यहां शहरीकरण और जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।

मसौढ़ी की राजनीतिक यात्रा लंबी रही है। 1957 में इसकी स्थापना के बाद, यह सीट कांग्रेस, सीपीआई, और जनता दल जैसी पार्टियों के बीच भी घूमती रही है। आरक्षण से पहले कांग्रेस ने तीन बार और सीपीआई एवं जेडीयू ने दो-दो बार जीत दर्ज की थी। लेकिन राजद ने अपनी पकड़ 2009 के लोकसभा चुनावों से ही मजबूत करना शुरू कर दिया था।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो मुख्यतः कृषि आधारित हैं, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं। इस सीट का भविष्य बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मसौढ़ी विधानसभा सीट का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
मसौढ़ी का इतिहास प्राचीन खगोल विज्ञान और गणित से जुड़ा हुआ है। यहाँ आर्यभट्ट ने खगोल वेधशाला स्थापित की थी।
कौन सी पार्टी मसौढ़ी में प्रमुखता रखती है?
पिछले एक दशक में राजद ने मसौढ़ी विधानसभा सीट पर प्रमुखता दिखाई है।
मसौढ़ी के मतदाता किस प्रकार के मुद्दों पर ध्यान देते हैं?
यहां के मतदाता मुख्य रूप से कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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