7 नवंबर 2026
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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मस्जिद ध्वस्तीकरण से पहले प्रभावित पक्ष को सुनवाई अनिवार्य

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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मस्जिद ध्वस्तीकरण से पहले प्रभावित पक्ष को सुनवाई अनिवार्य

सारांश

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने स्पष्ट किया — बुलडोजर चलाने से पहले कानून की प्रक्रिया पूरी करना और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। 18 जून से शुरू हुई कार्रवाई में 14 मस्जिदें और मजारें ध्वस्त हो चुकी हैं। यह फैसला देशभर में उचित प्रक्रिया की बहस को नई दिशा दे सकता है।

मुख्य बातें

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने 6 नवंबर 2026 को आदेश दिया कि मस्जिद ध्वस्तीकरण से पहले प्रभावित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य है।
राजस्थान सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया कि कारण बताओ नोटिस पर निर्णय होने तक कोई ध्वस्तीकरण कार्रवाई नहीं होगी।
18 जून 2026 से शुरू हुई बुलडोजर कार्रवाई में सीमावर्ती इलाकों की 14 मस्जिदों और मजारों को ध्वस्त किया गया था।
हाईकोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएँ 13 जुलाई 2026 को खारिज होने के बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ 15 दिनों का अंतरिम स्थगन आदेश मिला।
खंडपीठ ने अपीलकर्ताओं को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।
जमीयत उलमा-ए-हिंद ने संवैधानिक और कानूनी लड़ाई जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने 6 नवंबर 2026 को मस्जिदों और अन्य निर्माणों से संबंधित पाँच मामलों में ऐतिहासिक आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई से पूर्व कानूनी प्रक्रिया का कड़ाई से पालन और प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर देना अनिवार्य है। राजस्थान सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि कारण बताओ नोटिस पर निर्णय होने तक संबंधित निर्माणों के विरुद्ध कोई बुलडोजर कार्रवाई नहीं की जाएगी।

मुख्य घटनाक्रम

यह आदेश जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने गफूर बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया। प्रभावित पक्षों की ओर से जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर एडवोकेट हरीश कुमार पुरोहित और एडवोकेट इकबाल खान ने पैरवी की। एडवोकेट ताहिर हकीम और लीगल सेल के संयोजक प्रोफेसर निसार अहमद अंसारी ने भी सहयोग प्रदान किया।

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रशासन कारण बताओ नोटिस का जवाब प्राप्त करने और उस पर विचार करने से पहले ही बुलडोजर कार्रवाई कर रहा है, जिससे प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिल पा रहा।

अदालत के निर्देश

खंडपीठ ने अपीलकर्ताओं को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। साथ ही आदेश दिया कि जवाब प्राप्त होने के उपरांत सक्षम अधिकारी प्रभावित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर दें। सभी संबंधित दस्तावेजों पर विचार के बाद कानून के अनुसार कारण सहित लिखित आदेश पारित किया जाए।

इसी दिन खंडपीठ ने चार अन्य अपीलों का भी निस्तारण किया — इनमें बाड़मेर की मस्जिद आदर्श नगरी, मनोहर मस्जिद, जैसलमेर के भरीवाला निवासी हसन हुसैन और बाड़मेर के मलाना गाँव निवासी मुस्तफा खान की अपीलें शामिल हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि

जमीयत उलमा-ए-राजस्थान के अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्रों में मस्जिदों और दरगाहों के विरुद्ध यह कार्रवाई 18 जून 2026 को शुरू हुई थी, जिसमें 14 मस्जिदों और मजारों को ध्वस्त किया गया। आरोप है कि इस दौरान प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

इस कार्रवाई के विरोध में राजस्थान हाईकोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएँ दाखिल की गईं, जिन्हें 13 जुलाई 2026 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद जमीयत ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया, जहाँ वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पैरवी की और 15 दिनों का अंतरिम स्थगन आदेश प्राप्त हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बाद में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपीलें दाखिल की गईं।

ज़मीनी हालात और प्रतिनिधिमंडल का दौरा

बुलडोजर कार्रवाई के दौरान जमीयत उलमा-ए-हिंद का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल उत्तर प्रदेश जमीयत के अध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी के नेतृत्व में राजस्थान पहुँचा था, परंतु कथित तौर पर प्रतिनिधिमंडल को प्रभावित क्षेत्रों में जाने से रोका गया।

16 अक्टूबर 2026 को जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने मालासर और मीरपुरा सहित विभिन्न गाँवों में ध्वस्त मस्जिदों का जायजा लिया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने बताया कि ये मस्जिदें दूरदराज के पहाड़ी इलाकों की छोटी बस्तियों में स्थित थीं, जिन्हें स्थानीय लोगों ने कठिन परिस्थितियों में रेतीली ज़मीन पर बनवाया था।

आगे की राह

हाईकोर्ट के आदेश पर जमीयत उलमा-ए-राजस्थान ने उम्मीद जताई कि प्रभावित लोगों को न्याय मिलेगा और प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई करेगा। संगठन ने क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने के लिए कानूनी और संवैधानिक लड़ाई जारी रहेगी। गौरतलब है कि यह मामला देश में बुलडोजर कार्रवाई और उचित प्रक्रिया के व्यापक बहस के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी राज्य स्तर पर 40 से अधिक याचिकाएँ खारिज हुईं — यह विरोधाभास प्रशासनिक जवाबदेही की गंभीर खामी को उजागर करता है। असली सवाल यह है कि क्या आश्वासन महज़ अदालती कार्यवाही तक सीमित रहेगा या प्रभावित पक्षों को ज़मीनी स्तर पर वास्तविक सुनवाई मिलेगी। सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह की कार्रवाइयाँ सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति संवेदनशील संतुलन को भी प्रभावित करती हैं, जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है।
RashtraPress
7 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजस्थान हाईकोर्ट ने मस्जिद ध्वस्तीकरण मामले में क्या आदेश दिया?
जोधपुर खंडपीठ ने 6 नवंबर 2026 को आदेश दिया कि किसी भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देना अनिवार्य है। राजस्थान सरकार ने भी अदालत को आश्वासन दिया कि कारण बताओ नोटिस पर निर्णय होने तक ध्वस्तीकरण नहीं होगा।
राजस्थान में मस्जिदों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई कब और कहाँ शुरू हुई?
जमीयत उलमा-ए-राजस्थान के अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्रों में यह कार्रवाई 18 जून 2026 को शुरू हुई, जिसमें 14 मस्जिदों और मजारों को ध्वस्त किया गया। बाड़मेर और जैसलमेर जैसे इलाकों की छोटी बस्तियाँ इससे प्रभावित हुईं।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की क्या भूमिका रही?
हाईकोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएँ 13 जुलाई 2026 को खारिज होने के बाद जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की पैरवी के बाद 15 दिनों का अंतरिम स्थगन आदेश मिला और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बाद में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपीलें दाखिल की गईं।
जमीयत उलमा-ए-हिंद ने इस मामले में क्या भूमिका निभाई?
जमीयत उलमा-ए-हिंद ने प्रभावित लोगों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामले की पैरवी करवाई। संगठन के प्रतिनिधिमंडलों ने ध्वस्त मस्जिदों का जायजा लिया और संवैधानिक लड़ाई जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है।
अदालत ने आगे की प्रक्रिया के लिए क्या निर्देश दिए?
खंडपीठ ने अपीलकर्ताओं को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। इसके बाद सक्षम अधिकारी प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर देंगे और सभी दस्तावेजों पर विचार के बाद कारण सहित लिखित आदेश पारित करेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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