राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मस्जिद ध्वस्तीकरण से पहले प्रभावित पक्ष को सुनवाई अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने 6 नवंबर 2026 को मस्जिदों और अन्य निर्माणों से संबंधित पाँच मामलों में ऐतिहासिक आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई से पूर्व कानूनी प्रक्रिया का कड़ाई से पालन और प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर देना अनिवार्य है। राजस्थान सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि कारण बताओ नोटिस पर निर्णय होने तक संबंधित निर्माणों के विरुद्ध कोई बुलडोजर कार्रवाई नहीं की जाएगी।
मुख्य घटनाक्रम
यह आदेश जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने गफूर बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया। प्रभावित पक्षों की ओर से जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर एडवोकेट हरीश कुमार पुरोहित और एडवोकेट इकबाल खान ने पैरवी की। एडवोकेट ताहिर हकीम और लीगल सेल के संयोजक प्रोफेसर निसार अहमद अंसारी ने भी सहयोग प्रदान किया।
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रशासन कारण बताओ नोटिस का जवाब प्राप्त करने और उस पर विचार करने से पहले ही बुलडोजर कार्रवाई कर रहा है, जिससे प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिल पा रहा।
अदालत के निर्देश
खंडपीठ ने अपीलकर्ताओं को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। साथ ही आदेश दिया कि जवाब प्राप्त होने के उपरांत सक्षम अधिकारी प्रभावित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर दें। सभी संबंधित दस्तावेजों पर विचार के बाद कानून के अनुसार कारण सहित लिखित आदेश पारित किया जाए।
इसी दिन खंडपीठ ने चार अन्य अपीलों का भी निस्तारण किया — इनमें बाड़मेर की मस्जिद आदर्श नगरी, मनोहर मस्जिद, जैसलमेर के भरीवाला निवासी हसन हुसैन और बाड़मेर के मलाना गाँव निवासी मुस्तफा खान की अपीलें शामिल हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
जमीयत उलमा-ए-राजस्थान के अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्रों में मस्जिदों और दरगाहों के विरुद्ध यह कार्रवाई 18 जून 2026 को शुरू हुई थी, जिसमें 14 मस्जिदों और मजारों को ध्वस्त किया गया। आरोप है कि इस दौरान प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
इस कार्रवाई के विरोध में राजस्थान हाईकोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएँ दाखिल की गईं, जिन्हें 13 जुलाई 2026 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद जमीयत ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया, जहाँ वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पैरवी की और 15 दिनों का अंतरिम स्थगन आदेश प्राप्त हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बाद में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपीलें दाखिल की गईं।
ज़मीनी हालात और प्रतिनिधिमंडल का दौरा
बुलडोजर कार्रवाई के दौरान जमीयत उलमा-ए-हिंद का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल उत्तर प्रदेश जमीयत के अध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी के नेतृत्व में राजस्थान पहुँचा था, परंतु कथित तौर पर प्रतिनिधिमंडल को प्रभावित क्षेत्रों में जाने से रोका गया।
16 अक्टूबर 2026 को जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने मालासर और मीरपुरा सहित विभिन्न गाँवों में ध्वस्त मस्जिदों का जायजा लिया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने बताया कि ये मस्जिदें दूरदराज के पहाड़ी इलाकों की छोटी बस्तियों में स्थित थीं, जिन्हें स्थानीय लोगों ने कठिन परिस्थितियों में रेतीली ज़मीन पर बनवाया था।
आगे की राह
हाईकोर्ट के आदेश पर जमीयत उलमा-ए-राजस्थान ने उम्मीद जताई कि प्रभावित लोगों को न्याय मिलेगा और प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई करेगा। संगठन ने क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने के लिए कानूनी और संवैधानिक लड़ाई जारी रहेगी। गौरतलब है कि यह मामला देश में बुलडोजर कार्रवाई और उचित प्रक्रिया के व्यापक बहस के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।