मौलाना साजिद रशीदी के इस्लामिक कानून बयान पर बढ़ा विवाद, ताहिरुद्दीन ताहिर ने किया समर्थन
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 29 अगस्त — मौलाना साजिद रशीदी के भारत में इस्लामिक कानून लागू करने संबंधी बयान को लेकर देशभर में विवाद गहराता जा रहा है। आगरा की खुद्दाम-ए-रोजा ताजमहल उर्स कमेटी से जुड़े ताहिरुद्दीन ताहिर ने इस बयान का खुलकर समर्थन किया है, जबकि अयोध्या के संत दिवाकराचार्य महाराज ने इसका कड़ा विरोध जताया है।
ताहिरुद्दीन ताहिर का समर्थन और तर्क
ताहिरुद्दीन ताहिर ने कहा कि अगर भारत में इस्लामिक कानून लागू हो, तो अपराध की प्रकृति के अनुसार दंड का प्रावधान होगा। उन्होंने सऊदी अरब का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ के सख्त कानूनों के कारण अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होती है।
उनका दावा है कि सख्त दंड-व्यवस्था से चोरी, छेड़छाड़, बलात्कार और अन्य अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में यदि मौजूदा कानूनों को कठोरता से लागू किया जाए, तो अपराध दर में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
संत दिवाकराचार्य महाराज की कड़ी आपत्ति
अयोध्या के संत दिवाकराचार्य महाराज ने मौलाना रशीदी के बयान को संविधान-विरोधी मानसिकता का प्रतीक बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत में संविधान सर्वोच्च है और देश की शासन-व्यवस्था संविधान के अनुसार ही संचालित होती है।
उनके अनुसार, किसी भी व्यक्ति को संविधान से ऊपर किसी अन्य व्यवस्था की माँग करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने आगाह किया कि जब इस तरह के बयानों पर विभिन्न धाराओं में मुकदमे दर्ज होंगे, तो बयान देने वाले माफी माँगते नजर आएंगे।
मुफ्ती रजवी बरेलवी की संतुलित राय
मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस पूरे विवाद पर संतुलित दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि भारत न कभी हिंदू राष्ट्र बन सकता है और न इस्लामी राष्ट्र — यह एक लोकतांत्रिक देश है जो जम्हूरी निजाम के तहत चलता है।
उन्होंने कहा कि भारत में अनेक धर्मों और मसलकों के मानने वाले लोग रहते हैं, और संविधान ने सभी को अपने अकीदे के अनुसार जीने की आजादी दी है। उनके अनुसार, यही आजादी भारत की वैश्विक पहचान का आधार है। मुफ्ती रजवी ने चेतावनी दी कि शरीयत कानून लागू करने की माँग से दूसरा तबका हिंदू राष्ट्र की माँग उठाएगा, जिससे टकराव की स्थिति पैदा होगी — और यह टकराव न देश के हित में होगा, न समाज के।
विवाद की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश में धार्मिक कानूनों और समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर बहस पहले से जारी है। मौलाना साजिद रशीदी का बयान कथित तौर पर इसी परिप्रेक्ष्य में आया, जिसने विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समूहों में तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न की है।
आगे क्या
इस विवाद के राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ अभी स्पष्ट होने बाकी हैं। विभिन्न धार्मिक नेताओं की परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ यह दर्शाती हैं कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और अधिक बहस का केंद्र बन सकता है।