मायावती का UPI शुल्क पर हमला: 15 अक्टूबर से आमजन की जेब पर पड़ेगा बोझ, स्मार्ट स्कूल से पहले बुनियाद सुधारो
सारांश
मुख्य बातें
बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने 18 सितंबर 2026 को केंद्र और राज्य सरकार पर दोहरा हमला बोला — एक ओर 15 अक्टूबर से लागू होने वाली नई UPI शुल्क व्यवस्था को 'जनता की जेब काटने' की नीति बताया, तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के 14,429 परिषदीय विद्यालयों को स्मार्ट स्कूल बनाने की ₹300 करोड़ की योजना को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अधूरा कदम करार दिया। मायावती ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर सिलसिलेवार पोस्ट के ज़रिये ये प्रहार किए।
UPI शुल्क पर मायावती का तीखा विरोध
मायावती ने कहा कि UPI डिजिटल लेनदेन को पहले जमकर प्रोत्साहित करने के बाद अब उस पर शुल्क वसूलना 'मुनाफाखोरी के पूंजीवादी रवैये' के तहत जनता से दोनों हाथों से कर वसूली है। उनके अनुसार, इस व्यवस्था को सरकार चाहे जो नाम दे, 15 अक्टूबर से लागू होने के बाद बोझ अंततः आम जनता की जेब पर ही पड़ेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि भले ही सरकार इसे औपचारिक रूप से 'कर' नहीं मान रही, लेकिन व्यावहारिक असर वही है। यह ऐसे समय में आया है जब देश की बहुसंख्यक आबादी गरीबी और महंगाई की दोहरी मार झेल रही है।
सरकार की नीति पर सवाल
मायावती ने तर्क दिया कि सरकार की नीति और कार्ययोजना 'लाभ कमाने वाली व्यावसायिक' की बजाय 'कल्याणकारी' अधिक होनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'जनता की तंगी और दुख-तकलीफ की अगर सरकार चिंता नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा?' — यह पंक्ति उनकी पोस्ट का केंद्रीय भाव रही।
गौरतलब है कि UPI पर शुल्क का मुद्दा विपक्ष और उपभोक्ता संगठनों दोनों के लिए संवेदनशील है, क्योंकि देश में डिजिटल भुगतान अपनाने की दर तेज़ी से बढ़ी है और करोड़ों उपभोक्ता छोटे-छोटे लेनदेन के लिए UPI पर निर्भर हैं।
स्मार्ट स्कूल योजना पर उठाए सवाल
उत्तर प्रदेश सरकार की ₹300 करोड़ की लागत से करीब 14,500 स्कूलों को 'स्मार्ट स्कूल' बनाने की घोषणा को मायावती ने सैद्धांतिक रूप से अच्छा बताया, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न उठाए। उनका कहना था कि डिजिटल शिक्षा से पहले बच्चों के लिए छत, बेंच, कुर्सी, किताब, शौचालय, खेल का मैदान और साफ-सफाई जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी होनी चाहिए।
मायावती ने आर्थिक व्यवहार्यता पर सीधा सवाल उठाया कि प्रति विद्यालय करीब ₹2 लाख के बजट में ये सब सुविधाएं सुनिश्चित करना संभव है या नहीं — इस पर सरकार को 'सहानुभूतिपूर्वक विचार' करना चाहिए।
आम जनता और बच्चों पर असर
यह बहस ऐसे समय में उठी है जब उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में नामांकन और बुनियादी ढाँचे को लेकर पहले से ही चिंताएं व्यक्त होती रही हैं। आलोचकों का कहना है कि तकनीक-आधारित पहल तब तक प्रभावी नहीं होती जब तक भौतिक बुनियाद मजबूत न हो।
UPI शुल्क के मोर्चे पर, विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे व्यापारी और ग्रामीण उपभोक्ता — जो कम मूल्य के लेनदेन करते हैं — इस बदलाव से सबसे अधिक प्रभावित होंगे। आने वाले हफ्तों में सरकार की ओर से इस पर स्पष्टीकरण और संभावित राहत उपायों की प्रतीक्षा है।