परिसीमन विवाद: मेघवाल का विपक्ष पर करारा प्रहार — 'संविधान पढ़ें, सिर्फ लेकर न चलें'
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 14 अगस्त 2026 को परिसीमन मुद्दे पर विपक्षी दलों की आशंकाओं को सिरे से खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की कि विपक्षी नेता संविधान की प्रतियाँ लेकर चलते हैं, लेकिन उसके प्रावधानों को ध्यान से पढ़ते नहीं। एक विशेष साक्षात्कार में मेघवाल ने स्पष्ट किया कि परिसीमन संविधान में निहित अनिवार्यता है, न कि सरकार की मनमर्जी।
मुख्य घटनाक्रम
केंद्रीय मंत्री ने कहा, 'विपक्ष जानता है कि संविधान में 2026 लिखा हुआ है और परिसीमन करना ही होगा। यह संविधान में लिखा हुआ है।' उन्होंने आगे कहा, 'वे संविधान की किताब लेकर चलते हैं, लेकिन संविधान में क्या लिखा है? वे उसे पढ़ते नहीं हैं।' यह बयान विपक्षी दलों की उस माँग के जवाब में आया जिसमें सत्तारूढ़ दल से परिसीमन पर सावधानी बरतने की अपील की गई थी।
संसदीय पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि केंद्र सरकार पहले ही परिसीमन विधेयक, 2026 और उससे संबंधित संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश कर चुकी है। लोकसभा में 16 और 17 अप्रैल को इस पैकेज पर 21 घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई, जिसमें 131 सांसदों ने भाग लिया। हालाँकि, संविधान संशोधन विधेयक सदन में पारित नहीं हो सका — जो इस मुद्दे की राजनीतिक जटिलता को रेखांकित करता है।
विपक्ष के आरोपों पर पलटवार
मेघवाल ने विपक्ष के उस दावे को भी नकारा कि संसद में उनके सदस्यों को बोलने की स्वतंत्रता नहीं दी जाती। उन्होंने कहा, 'एक तरफ वे कहते हैं कि हमें बोलने की आजादी नहीं है और दूसरी तरफ वे अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं। अगर विपक्ष कह रहा है कि उन्हें बोलने की आजादी नहीं है, तो वे बोल कैसे रहे हैं?' मंत्री ने यह भी जोड़ा कि विपक्ष के सदस्य स्वयं ही असंसदीय आचरण अपनाना चाहते हैं, जिससे नए सांसद भी असहज हैं।
आम जनता पर असर
परिसीमन की प्रक्रिया सीधे तौर पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को प्रभावित करती है, जिसका असर करोड़ों मतदाताओं के प्रतिनिधित्व पर पड़ेगा। दक्षिणी राज्यों में विशेष रूप से यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि जनसंख्या वृद्धि के आधार पर परिसीमन से उनकी संसदीय सीटें अपेक्षाकृत कम हो सकती हैं।
आगे की राह
संविधान संशोधन विधेयक के लोकसभा में अटके रहने के बाद सरकार की अगली रणनीति अभी स्पष्ट नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बहस आगामी सत्रों में और तीखी हो सकती है, क्योंकि 2026 की संवैधानिक समयसीमा निकट आ रही है।