परिसीमन से सीमावर्ती राज्यों को नुकसान का खतरा, मनीष तिवारी ने माँगी गंभीर समीक्षा
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने रविवार, 9 अगस्त को चंडीगढ़ में प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी कि यह प्रक्रिया उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के उन राज्यों के लिए हानिकारक साबित हो सकती है जिनकी सीमाएँ अंतरराष्ट्रीय सरहदों से सटी हैं। उनके अनुसार, इस प्रक्रिया से केवल मध्य भारत को अनुचित राजनीतिक लाभ मिल सकता है, जबकि सीमावर्ती राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व कमज़ोर पड़ सकता है।
मुख्य आपत्तियाँ और तर्क
तिवारी ने कहा, "असल बात यह है कि जब मैंने अप्रैल में लोकसभा में परिसीमन बिल पर बहस की थी, तब भी कहा था कि इस परिसीमन से उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत को नुकसान होगा। अगर इस परिसीमन से किसी को फायदा होगा, तो वह सिर्फ मध्य भारत को होगा।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो राज्य सीमा पर हैं या उत्तर और पूर्वोत्तर भारत में हैं, उनके हित में यह परिसीमन नहीं है और इस पर बहुत गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है।
कांग्रेस सांसद ने क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन पर पड़ने वाले व्यापक असर को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि किसी भी अंतिम फैसले से पहले सीमावर्ती राज्यों की आपत्तियों को प्राथमिकता के साथ सुना जाना चाहिए।
परिसीमन और महिला आरक्षण का संबंध
यह विवाद संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक, 2026 को लेकर नए सिरे से उठी राजनीतिक बहस के बीच आया है। इन विधेयकों का उद्देश्य महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 से जुड़े प्रावधानों में संशोधन करना और 2029 के आम चुनावों से पहले लोकसभा की सीटों की संख्या तथा उनके बंटवारे में बदलाव करना है। गौरतलब है कि अप्रैल में बजट सत्र के दौरान यह अधिनियम लोकसभा में पारित नहीं हो पाया था।
तिवारी ने तर्क दिया कि सरकार को महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को परिसीमन प्रक्रिया से नहीं जोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा, "सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण की बात कर रही है, तो इसे मौजूदा सीटों पर लागू क्यों नहीं किया जाता? इन 543 सीटों में से एक-तिहाई आरक्षण महिलाओं को क्यों नहीं दिया जाता? कांग्रेस पार्टी ही महिलाओं के लिए आरक्षण बिल लेकर आई थी और अगर वे सच में इसे लागू करना चाहते हैं, तो इन 543 सीटों पर ही इसे लागू करें।"
शिक्षा तंत्र पर निशाना
भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद धर्मेंद्र प्रधान के एक बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए तिवारी ने देश में हुए बड़े छात्र आंदोलन और नीट पेपर लीक प्रकरण का हवाला दिया। उन्होंने कहा, "नीट पेपर लीक इस बात का सबूत बन गया कि भारत का शिक्षा तंत्र पूरी तरह से बेबस हो गया है।" उनका कहना था कि देश में शिक्षा के नाम पर केवल कागजी डिग्रियाँ दी जा रही हैं जो रोज़गार दिलाने में नाकाम हैं, और इसीलिए पूरी शिक्षा प्रणाली पर नए नज़रिए से सोचने की ज़रूरत है।
आगे क्या
परिसीमन विधेयक पर संसद में बहस आगामी सत्र में जारी रहने की संभावना है। विपक्षी दलों — विशेष रूप से दक्षिण और पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय दलों — का विरोध इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाए रखेगा। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार सीमावर्ती राज्यों की चिंताओं को किस हद तक समायोजित करती है।